भ्रष्टाचार की 'मछलियों' ने गंदा किया विकास का मानसरोवर; जनप्रतिनिधि निधि या कमीशन का खेल? Aajtak24 News

भ्रष्टाचार की 'मछलियों' ने गंदा किया विकास का मानसरोवर; जनप्रतिनिधि निधि या कमीशन का खेल? Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज। लोकतंत्र के दो प्रमुख स्तंभ—विधायिका और कार्यपालिका—जिनका काम समाज में न्याय और विकास सुनिश्चित करना है, आज स्वयं सवालों के घेरे में हैं। रीवा और मऊगंज जिले के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा आम है कि विकास के लिए आने वाला पैसा जनता तक पहुँचने से पहले ही 'कमीशनखोरी' की भेंट चढ़ रहा है। विंध्य के विकास रूपी मानसरोवर को भ्रष्टाचार की उन 'गंदी मछलियों' ने दूषित कर दिया है, जो जनसेवा का चोला ओढ़कर सरकारी खजाने को दीमक की तरह चाट रही हैं।

25 से 30 प्रतिशत का 'निश्चित' रेट कार्ड

क्षेत्र में चर्चा है कि अब विकास कार्यों की स्वीकृति गुणवत्ता के आधार पर नहीं, बल्कि 'कमीशन' के प्रतिशत पर तय होती है। सूत्रों की मानें तो रीवा और मऊगंज के कई विधानसभा क्षेत्रों में 25% से 30% तक का कमीशन 'ओपन सीक्रेट' बन चुका है। भ्रष्टाचार के इस खेल में सबसे आसान शिकार वे छोटे निर्माण कार्य बने हैं, जिनका भौतिक सत्यापन अक्सर कागजों तक सीमित रहता है।

इस खेल की तीन प्रमुख कड़ियाँ हैं:

  • यात्री प्रतीक्षालय: लाखों की लागत से बने ये शेड जमीन पर जर्जर हैं या फिर केवल फाइलों में खड़े हैं।

  • पानी टैंकर: भीषण गर्मी में जनता की प्यास बुझाने के लिए खरीदे गए टैंकरों की संख्या और उनके बिलों की गहराई, उनकी वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक है।

  • पेवर ब्लॉक: गलियों को चकाचक करने के लिए बिछाए गए ब्लॉक पहली ही बारिश में उखड़कर भ्रष्टाचार की गवाही दे रहे हैं।

गायब होती संरचनाएं: भ्रष्टाचार का 'जादुई' खेल

विंध्य में भ्रष्टाचार का स्तर इतना 'जादुई' हो चुका है कि यहाँ सरकारी संपत्तियां रातों-रात गायब हो जाती हैं। शासकीय रिकॉर्ड बताते हैं कि स्वच्छता अभियान के तहत लैट्रिन टैंक बने, रसीदें कटीं और भुगतान भी हो गया, लेकिन जब मौके पर जाकर देखा गया तो वहां टैंकों का नामोनिशान तक नहीं था। जल संवर्धन और हरियाली प्रोजेक्ट के नाम पर करोड़ों रुपये स्वाहा कर दिए गए, लेकिन न कहीं पानी का संचय हुआ और न ही पौधे जीवित बचे। पूर्ववर्ती और वर्तमान सरकारों के बीच भ्रष्टाचार के पुराने रिकॉर्ड तोड़ने की जैसे होड़ लगी हुई है।

जनता बनी 'अभिमन्यु', सारथी की तलाश

आज विकास के नाम पर बुने गए इस जटिल चक्रव्यूह में आम जनता 'अभिमन्यु' की तरह फंसी हुई है। सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक पहुँचने से पहले ही बिचौलियों और रसूखदारों की तिजोरी में जा रहा है। विडंबना यह है कि जो जनप्रतिनिधि धार्मिक और सनातन मूल्यों की दुहाई देते नहीं थकते, उन्हीं के संरक्षण में भ्रष्टाचार का यह नंगा नाच चल रहा है।

अब जवाबदेही का वक्त

बड़ा सवाल यह है कि इस तंत्र को साफ करने के लिए 'सफाई अभियान' कब शुरू होगा? क्या जिला प्रशासन इन रसूखदार 'मगरमच्छों' पर हाथ डालने की हिम्मत जुटा पाएगा? जब तक कमीशनखोरी के इस सिंडिकेट को ध्वस्त नहीं किया जाता और दोषियों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक विकास की कोई भी योजना सफल नहीं हो सकती। जनता अब फाइलों की बाजीगरी से ऊब चुकी है; उसे जमीन पर ईमानदारी और पारदर्शी प्रशासन की दरकार है।

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