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| आधी रात को सड़कों पर पहरा दे रही जनता, रसूखदारों के घर बिना कतार पहुँच रहे सिलेंडर! Aajtak24 News |
रीवा - जिले में एलपीजी रसोई गैस की किल्लत ने अब एक भयावह मानवीय संकट का रूप ले लिया है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि नोटबंदी और कोरोना काल की यादें ताज़ा हो गई हैं। रीवा की सड़कों पर आधी रात को लोग खाली सिलेंडर लेकर पहरा देने को मजबूर हैं, जबकि इंडेन, भारत और एचपी जैसी गैस एजेंसियों की वितरण प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त नजर आ रही है।
अमानवीय स्थितियां और प्रशासनिक मौन गैस एजेंसी कार्यालयों के बाहर का नजारा रूह कंपा देने वाला है। केवाईसी और टोकन के नाम पर उपभोक्ताओं को घंटों कतारों में खड़ा किया जा रहा है। भीषण अव्यवस्था के बीच न तो पीने के पानी का प्रबंध है और न ही धूप से बचने के लिए छाया। सबसे नारकीय स्थिति महिलाओं की है, जिन्हें शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा न होने के कारण अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। एजेंसी संचालकों की संवेदनहीनता और जिला प्रशासन की चुप्पी ने जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है।
रसूखदारों को 'नवाज़िश', जनता को 'धक्के' आक्रोश इस बात का है कि इन लंबी लाइनों में कोई भी जनप्रतिनिधि या बड़ा अधिकारी नजर नहीं आता। आरोप है कि सत्ता के संरक्षण में रसूखदारों को घर बैठे सिलेंडर पहुँचाए जा रहे हैं, जबकि आम आदमी अपनी बारी का इंतजार करते-करते दम तोड़ रहा है। रसूखदारों की इसी चुप्पी ने कालाबाजारी करने वालों को 'खुला लाइसेंस' दे दिया है।
कालाबाजारी का 'नंगा नाच' एक तरफ गैस की कमी का रोना रोया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ₹2000 में घरेलू सिलेंडर ब्लैक में बेचे जा रहे हैं। कमर्शियल सिलेंडर की कीमत ₹3500 से ₹4000 तक पहुँच गई है। लालगांव और गढ़ जैसे क्षेत्रों में करोड़ों की अनियमितता की गूंज है, लेकिन खाद्य विभाग कुंभकर्णी नींद सोया हुआ है। होटलों और ठेलों पर घरेलू सिलेंडरों का अवैध उपयोग खुलेआम जारी है, जिससे आम जनता के हक की गैस 'ब्लैक' के रास्ते बाहर जा रही है।
जन-आंदोलन की आहट शादी-ब्याह के सीजन में चूल्हे ठंडे पड़ने से जनता का सब्र अब जवाब दे रहा है। यदि तत्काल स्टॉक की भौतिक जांच कर दोषियों पर एफआईआर दर्ज नहीं की गई, तो रीवा की यह सुलगती चिंगारी किसी भी वक्त उग्र जन-आंदोलन का रूप ले सकती है।
