रीवा-सतना मंडी बोर्ड में 'डिजिटल डकैती': ऐप पर हाजिरी, घर पर आराम और खाते में सरकारी वेतन का बड़ा खेल Aajtak24 News

रीवा-सतना मंडी बोर्ड में 'डिजिटल डकैती': ऐप पर हाजिरी, घर पर आराम और खाते में सरकारी वेतन का बड़ा खेल Aajtak24 News

रीवा - विंध्य की धरा पर डिजिटल क्रांति के नाम पर पारदर्शिता का जो ढोंग रचा गया था, आज उसकी कलई खुल चुकी है। रीवा संभाग के मंडी बोर्ड से एक ऐसा 'महाघोटाला' सामने आया है जिसने प्रशासनिक नैतिकता के परखच्चे उड़ा दिए हैं। यहाँ बायोमेट्रिक और मोबाइल ऐप के जरिए उपस्थिति दर्ज करने की सुविधा को कुछ भ्रष्ट चेहरों ने अपनी तिजोरी भरने का जरिया बना लिया। इस पूरे खेल के दो सबसे बड़े किरदार बनकर उभरे हैं— सतना मंडी सचिव करुणेश तिवारी और रीवा के विष्णु शुक्ला

करुणेश तिवारी: जिस पर थी जिम्मेदारी, वही बना घोटाले का खिलाड़ी

जांच रिपोर्ट की परतों ने सबसे पहले सतना मंडी के सचिव करुणेश तिवारी को बेनकाब किया है। एक सचिव का दायित्व होता है कि वह अपने मातहतों की कार्यप्रणाली पर नजर रखे, लेकिन यहाँ तो 'बाड़ ही खेत को खाने लगी'। करुणेश तिवारी पर आरोप है कि उन्होंने डिजिटल चाबी का इस्तेमाल अपनी मर्जी से किया। खुद दफ्तर न आकर मोबाइल ऐप के जरिए फर्जी हाजिरी दर्ज की और इसी भ्रष्ट तंत्र को अपने चहेते कर्मचारियों के लिए भी खुला छोड़ दिया। सवाल यह है कि जब जिले का सबसे बड़ा मंडी अधिकारी ही 'घर बैठे ड्यूटी' कर रहा हो, तो पारदर्शिता की उम्मीद किससे की जाए?

विष्णु शुक्ला: दफ्तर की धूल से परहेज, वेतन से गहरा प्रेम

रीवा से जुड़ा दूसरा बड़ा नाम विष्णु शुक्ला का है। जांच में जो तथ्य सामने आए हैं वे चौकाने वाले हैं। विष्णु शुक्ला उन 'विशिष्ट' कर्मचारियों की सूची में शामिल हैं जिन्होंने महीनों तक कार्यालय का दरवाजा तक नहीं देखा, लेकिन हर महीने की एक तारीख को उनके मोबाइल पर 'वेतन क्रेडिट' होने का मैसेज पूरी ईमानदारी से आता रहा। यह जनता के टैक्स के पैसों की सरेआम डकैती है। विष्णु शुक्ला और उनके जैसे कई चेहरों ने 'वर्क फ्रॉम होम' की एक ऐसी परिभाषा लिख दी है, जिसे सुनकर विभाग के ईमानदार कर्मचारी भी सन्न हैं।

संगठित मिलीभगत का 'समानांतर तंत्र'

यह महज तकनीकी खराबी या लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि एक संगठित आर्थिक अपराध है। रीवा संभाग के छह जिलों में फैले इस जाल में केवल करुणेश और विष्णु ही नहीं, बल्कि एक पूरी चैन शामिल है। जब रक्षक (सचिव) ही चोरों के साथ मिल जाए, तो व्यवस्था का पतन निश्चित है। जांच में खुलासा हुआ कि ऐप की लोकेशन और टेक्निकल खामियों का फायदा उठाकर इन लोगों ने विभाग की आंखों में धूल झोंकी।

7 दिन की मोहलत: न्याय होगा या फिर 'फाइल' दफन होगी?

मंडी बोर्ड ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अब कड़ा रुख अपनाया है। आरोपितों को 7 दिन के भीतर स्पष्टीकरण देने का नोटिस जारी किया गया है और 10 दिन के भीतर अंतिम जांच रिपोर्ट तलब की गई है। लेकिन रीवा की जनता के मन में संशय है— क्या करुणेश तिवारी और विष्णु शुक्ला जैसे रसूखदारों पर एफआईआर (FIR) होगी? क्या उनके द्वारा डकारे गए वेतन की वसूली होगी? या फिर, चंद दिनों के शोर के बाद ये फाइलें भी धूल फांकने के लिए छोड़ दी जाएंगी?

डिजिटल इंडिया का मजाक

एक ओर सरकार 'विकसित मध्य प्रदेश' और 'पारदर्शी डिजिटल गवर्नेंस' की बात करती है, वहीं दूसरी ओर करुणेश और विष्णु जैसे लोग डिजिटल सिस्टम को अपनी अवैध कमाई का हथियार बना लेते हैं। इन्होंने साबित कर दिया कि तकनीकी कितनी भी एडवांस क्यों न हो, यदि इंसान की नीयत में खोट है, तो भ्रष्टाचार का रास्ता निकल ही आता है। रीवा संभाग का यह घोटाला प्रशासनिक नैतिकता के पतन का सबसे ताजा दस्तावेज है। अब गेंद सरकार और उच्चाधिकारियों के पाले में है। यदि इन 'डिजिटल डकैतों' पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लिया जाएगा कि शासन में बैठे रसूखदारों के लिए नियम और कानून केवल कागजों तक सीमित हैं। करुणेश तिवारी और विष्णु शुक्ला— इन दो नामों ने पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

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