मौत पर भी घमंड! जब सत्ता की भाषा मर्यादा नहीं, मुँहज़ोरी बन जाए Aajtak24 News

मौत पर भी घमंड! जब सत्ता की भाषा मर्यादा नहीं, मुँहज़ोरी बन जाए Aajtak24 News 

रीवा - रीवा के पत्रकारों ने इंदौर की घटना की घोर निंदा की जब एक वरिष्ठ मंत्री वरिष्ठ पत्रकार के साथ मर्यादा की सीमा भूल सकते हैं तो जिले और गांव के पत्रकारों की क्या स्थिति होगी, लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी यह नहीं कि सत्ता कितनी मज़बूत है, बल्कि यह है कि वह सवालों के सामने कितनी संवेदनशील और विनम्र रहती है। मध्यप्रदेश के इंदौर में दूषित पानी से हुई मौत के बाद जिस प्रकार मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने एक पत्रकार के सवाल पर “घंटा सवाल मत पूछो” जैसी भाषा का प्रयोग किया, वह केवल एक व्यक्ति की तल्ख़ी नहीं, बल्कि सत्ता-संस्कार के पतन का सार्वजनिक उद्घोष है। यह कोई साधारण वाक्य नहीं था। यह उस क्षण का प्रतीक है, जब एक नागरिक की मौत भी सत्ता के अहंकार के सामने तुच्छ ठहरा दी जाती है। सवाल पूछना पत्रकार का अधिकार नहीं, कर्तव्य है। और उस सवाल का उत्तर देना मंत्री का संवैधानिक दायित्व। लेकिन जब उत्तर की जगह अपमान, और संवेदना की जगह अकड़ आ जाए, तब समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र की धमनियों में अहंकार का थक्का जम चुका है।

दूषित पानी और दूषित जवाब दूषित पानी से किसी की मौत होना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, यह राज्य की जिम्मेदारी का सीधा उल्लंघन है। पानी जीवन है और जब वही जीवन का कारण बनने के बजाय मृत्यु का माध्यम बन जाए, तब सत्ता को सिर झुकाकर जवाब देना चाहिए, न कि सवाल करने वालों को झिड़कना। यह घटना पूछती है कि क्या मौत पर सवाल पूछना अपराध है? क्या जवाबदेही अब सत्ता की “मर्यादा” के खिलाफ़ मानी जाएगी? अगर हाँ, तो फिर लोकतंत्र सिर्फ़ चुनावी पोस्टर बनकर रह गया है। मर्यादा किसकी? सत्ता की या जनता की? मंत्री की भाषा ने जिस “मर्यादा” की दुहाई दी, वह मर्यादा जनता की नहीं दिखी। मर्यादा तब तार-तार होती है, जब किसी परिवार का चिराग़ दूषित पानी से बुझ जाता है और सत्ता का प्रतिनिधि संवेदना की जगह दंभ ओढ़ लेता है। यह वही मर्यादा है जो भाषणों में तो दिखाई जाती है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई में दम तोड़ देती है।

मोदी युग, मोहन सरकार और ज़िम्मेदारी का सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार “संवेदनशील शासन” और “जवाबदेह प्रशासन” की बात करते हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव भी सुशासन का दावा करते हैं। लेकिन जब उन्हीं की सरकार का एक वरिष्ठ मंत्री मौत जैसे विषय पर भी संयम खो दे, तो सवाल दिल्ली से भोपाल तक उठता है कि क्या यह व्यक्तिगत भाषा थी, या सत्ता की स्वीकृत संस्कृति? यदि ऐसे वक्तव्य पर भी आत्ममंथन नहीं होगा, तो यह चुप्पी उस भाषा की मौन स्वीकृति मानी जाएगी। पत्रकार सवाल इसलिए पूछता है क्योंकि जनता जवाब चाहती है। जब मंत्री पत्रकार को अपमानित करता है, तो असल में वह जनता की जिज्ञासा और पीड़ा को ठुकराता है। यह केवल मीडिया पर हमला नहीं, यह लोकतांत्रिक संवाद की हत्या है। आज “घंटा सवाल मत पूछो” कहा गया है, कल शायद कहा जाएगा कि “घंटा वोट मत दो।”

सत्ता को आईना दिखाना ही पत्रकार का धर्म है, यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ़ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ़ है जो सत्ता को प्रश्नों से ऊपर समझती है। मौत पर घमंड, सवाल पर गुस्सा और संवेदना पर मौन, यह किसी भी सभ्य लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकती। यदि दूषित पानी से किसी की जान जाती है, तो पहला शब्द होना चाहिए- “क्षमा”, पहला कदम होना चाहिए- जांच, और पहला भाव होना चाहिए- संवेदना। घंटा नहीं, जवाब चाहिए। क्योंकि सवाल पूछना अपराध नहीं, और मौत पर चुप रहना कोई मर्यादा नहीं।



Post a Comment

Previous Post Next Post