आदेश जारी होने के बाद भी क्यों अटका है न्याय? जनता न्याय की राह में भटक रही, प्रशासन जवाबदेही से बच रहा Aajtak24 News

 

आदेश जारी होने के बाद भी क्यों अटका है न्याय? जनता न्याय की राह में भटक रही, प्रशासन जवाबदेही से बच रहा Aajtak24 News 

रीवा - लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल आधार जनता को त्वरित और निष्पक्ष न्याय दिलाना है, लेकिन हकीकत यह है कि सरकारी आदेश केवल कागजों तक ही सीमित होकर रह गए हैं। आदेश जारी होने के बावजूद उनका पालन महीनों और सालों तक नहीं हो पाता, जिसका खामियाजा आम जनता को उठाना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या प्रशासन अपने सबसे बड़े दायित्व, यानी जनता के प्रति जवाबदेही, से भाग रहा है?

गुढ़ तहसील का ताज़ा मामला: आदेश 8 महीने बाद भी बेअसर

तहसील गुढ़ (रीवा) में जारी एक हालिया आदेश इस प्रशासनिक उदासीनता का जीता-जागता प्रमाण है। राजस्व प्रकरण क्रमांक 0014/68/2024-25 में न्यायालय ने 23 दिसंबर 2024 को ही ग्राम पुरारा के खसरा नंबर 98 (रकबा 0.101 हेक्टेयर) से अनावेदक रामसजीवन कुशवाहा का अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था। आठ महीने बीत जाने के बाद भी यह आदेश केवल एक कागज़ का टुकड़ा बना रहा और अतिक्रमण जस का तस है। अब, 13 अगस्त 2025 को तहसीलदार ने एक नया आदेश जारी कर पटवारियों और पुलिस प्रशासन को सात दिन के भीतर अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया है। यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन यह सवाल भी खड़ा करता है कि इतने लंबे समय तक आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ? क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था?

'पहुंच' और 'पहुंच' का फर्क: न्याय केवल प्रभावशाली लोगों के लिए?

जमीनी हकीकत यह बताती है कि न्याय और कानून का पालन हर किसी के लिए एक जैसा नहीं है। यदि कोई मामला किसी बड़े ठेकेदार, राजनेता या प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा हो, तो आदेश का पालन 24 घंटे के भीतर ही हो जाता है। ऐसे मामलों में प्रशासन पूरी तत्परता से काम करता है। लेकिन जब बात किसी आम और गरीब नागरिक की आती है, तो बहानेबाज़ी, लंबी प्रक्रिया और फाइलों का अंबार लगाकर आदेशों को टाल दिया जाता है। कानून में हर आदेश के पालन के लिए एक तय समय-सीमा होती है। यदि उस समय-सीमा का उल्लंघन होता है, तो संबंधित अधिकारी पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में यह नियम केवल किताबों तक ही सीमित है। न तो किसी अधिकारी की जवाबदेही तय की जाती है और न ही जनता को यह बताया जाता है कि उनके मामले में देरी क्यों हो रही है।

पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव

आदेशों के पालन में देरी पर प्रशासन की तरफ से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया जाता। जनता को सूचना देने की तो बात ही दूर है, कई बार तो आदेश की प्रति भी समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती। यह पारदर्शिता की कमी आरोपों और अटकलों को जन्म देती है, जिससे जनता का विश्वास डगमगाता है। यह व्यवस्था लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, जहाँ हर नागरिक को समान और त्वरित न्याय का अधिकार है। यदि प्रशासन की यही कार्यप्रणाली रही तो आम जनता का लोकतंत्र और उसकी प्रक्रियाओं से विश्वास कमजोर होता जाएगा। यह एक गंभीर स्थिति है, जो न केवल सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है, बल्कि एक मजबूत और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में भी बाधा डालती है। प्रशासन को इस दिशा में तुरंत कदम उठाने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर आदेश का पालन तय समय-सीमा के भीतर हो और जनता के प्रति जवाबदेही तय की जाए।

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