मजदूरों के नाम पर मशीनें: कहाँ है रोजगार?
सरकारी योजनाओं का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन करना था, लेकिन पंचायतों में काम मजदूरों के नाम पर आवंटित होता है और कराया जाता है मशीनों से। जहाँ 100 मजदूरों को दिनभर काम मिल सकता है, वहीं वही काम मशीनें दो घंटे में निपटा देती हैं। इसका सीधा नुकसान न केवल बेरोजगार मजदूरों को होता है, बल्कि कार्य की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है, क्योंकि मशीनें अक्सर काम को सतही तौर पर करती हैं।
25 साल से अधूरा भवन: प्रशासन की पोल
रीवा जिले की ग्राम पंचायत गढ़ में जिला पंचायत सदस्य की सिफारिश पर स्वीकृत एक भवन का निर्माण पिछले 25 वर्षों से अधूरा पड़ा है। भवन की बाउंड्री तक पूरी नहीं हो पाई है। सरकारी कागजों में राशि स्वीकृत और खर्च दर्शाई गई है, लेकिन जमीन पर कोई काम नहीं हुआ। यह घटना सिर्फ सरपंच की लापरवाही नहीं, बल्कि अफसरों, इंजीनियरों और जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत की ओर इशारा करती है।
सेवा शुल्क का खुला खेल: कमीशनखोरी का नया नाम
गांवों में हर छोटे-बड़े काम, जैसे पानी के टैंकर की आपूर्ति, यात्री प्रतीक्षालय का निर्माण या नल-जल योजना, में कमीशनखोरी एक आम बात हो गई है। इसे अब लोग ‘सेवा शुल्क’ कहते हैं। हर कोई इसके बारे में जानता है, लेकिन डर और दबाव के कारण कोई भी खुलकर बोलने को तैयार नहीं होता। यही कारण है कि भ्रष्टाचार की सच्चाई “जनचर्चा” बनकर ही रह जाती है। हाल ही में, पंचायत स्तर पर ‘सेवा शुल्क’ के लेन-देन से जुड़े कुछ ऑडियो और वीडियो भी सामने आए हैं, जिन्होंने यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार सिर्फ एक अफवाह नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है।
निष्क्रिय जांच एजेंसियां और लोकतंत्र पर चोट
जनता को उम्मीद थी कि भाजपा सरकार पिछले शासनकाल के भ्रष्टाचार को उजागर कर पारदर्शिता लाएगी। लेकिन न तो कोई ईडी, सीबीआई या कोई अन्य जांच एजेंसी ऐसे मामलों का संज्ञान ले रही है। यह सवाल उठाता है कि जब कानून बनाने वाले खुद ही सवालों के घेरे में हों, तो निष्पक्ष जांच कौन करेगा? यह स्थिति लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर कर रही है। यदि जनप्रतिनिधि जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूलकर सिर्फ निजी लाभ के लिए काम करेंगे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सबसे बड़ा हमला होगा। जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ बदलाव चुना था, लेकिन अब भ्रष्टाचार की परतें खुलने की बजाय और भी मोटी होती जा रही हैं।