उम्रदराज हो चला नर्मदा नदी पर बना मोरटक्का पुल
आवागमन बन्द होने से पिछले 7 दिनों से राहत महसूस कर रहा पुल
बड़वाह (गोविंद शर्मा) - मध्यप्रदेश से महाराष्ट्र की सीमा को सड़क मार्ग से जोड़ने वाला इंदौर-इच्छापुर हायवे पर बडवाह के समीप स्थित नर्मदा नदी पर बना मोरटक्का पुल भले ही उम्रदराज हो चला हो लेकिन नर्मदा के प्रचंड वेग एवं लहरों के उग्र थपेड़ो के सामने आज भी डटकर कर खड़ा है। नर्मदा ने करीब 11 बार जलमग्न कर इसके होंसलो को तोड़ने का भरसक प्रयास भी किया। लेकिन हर बार अपनी मजबूत ईच्छाशक्ति की बदौलत से जस का तस खड़ा है।
58 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह क्षमता से कही अधिक भार वहन करने में सक्षम है। साथ ही इस पर आवागमन सुचारू रुप से चल सकता है। 714 मीटर लम्बा व 25 फिट 3 इंच चोड़ा यह पुल करीब 22 आर्च और 24 पिल्लर पर टिका हुआ है। आजादी के बाद लखनऊ की लाला उमराव सिंह एंड कम्पनी द्वारा इसका निर्माण शुरू किया था। वर्ष 1958 में इसका निर्माण पूर्ण होकर 1959 में प्रारम्भ हुआ था। उस समय इसके निर्माण में करीब 40 लाख की लागत आई थी। जबकि निर्माण एजेंसी पीडब्ल्यूडी थी।
भले ही अपनी समय सीमा पार कर चुका यह पुल उफनती नर्मदा के वेग को सम्भालने में सक्षम है। लेकिन पिछले सात दिनो से आवागमन बन्द होने से कुछ राहत महसूस कर रहा है।
पीडब्ल्यूडी एनवीडीए में मानचित्रकार के पद से सेवानिवृत मदन सिंह ठाकुर ने बताया की जब पुल का निर्माण हो रहा था तब वे खरगोन पीडब्ल्यूडी ऑफिस में टाईमकीपर के पद पर पदस्थ थे।
यह पुल पहले खंडवा डिविजन में लगता था। जो आकोला सर्कल में आता था। तत्कालीन चीफ इंजिनीयर एलएच भाटिया के निर्देशन में यह पुल बना था।मोरटक्का की और पिलर बनाते समय फाउंडेशन नही मिलने के कारण उस तरफ़ तीन आर्च पिलर के बिच की दुरी काफी कम बनी हुई हैं।
नावघाट खेड़ी में रहने वाली वयोवृद्ध चरण दीदी का पुल से एक खास रिश्ता है।पुल निर्माण के दौरान उनके पिताजी इसमें ठेकेंदारी करते थे।अपने भाई सहित स्वयं चरण दीदी ने भी निर्माण कार्य में अपना सहयोग दिया है।
उन्होंने बताया की बड़ी संख्या में मजदूर दिन के साथ रात में भी पुल का निर्माण कार्य करते थे। एक बार पुल निर्माण के दौरान हादसा भी हो गया था।पुल की स्लैब निचे गिर गई थी। जिसमे दबने से कुछ मजदूरों की मौत भी हुई थी।
पुल के न होने के पहले बड़ी नाव में बस को उतारकर आर-पार किया जाता था। तक बसे भी छोटी चलती थी। लेकिन बारिश के दिनों में चार माह यह मार्ग बंद रहता था। लेकिन अब इसका विकल्प आवश्यक हो गया है।
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