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| पर्यावरण संरक्षण के दावे कितने कारगर? घटती हरियाली और गिरते जलस्तर पर चिंता |
रीवा। पर्यावरण संरक्षण के लिए हर साल पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं और जल संरक्षण के संकल्प लिए जाते हैं, लेकिन इन प्रयासों के वास्तविक परिणामों का आकलन भी उतना ही जरूरी है। रीवा संभाग में वृक्षों के संरक्षण, पारंपरिक जलस्रोतों की स्थिति और भूजल स्तर को लेकर उठ रहे सवाल इस दिशा में गंभीर समीक्षा की आवश्यकता बताते हैं। महुआ, आम, जामुन और नीम जैसे उपयोगी वृक्षों का सूखना, तालाबों का सिकुड़ना और प्राकृतिक जलधाराओं पर बढ़ता दबाव पर्यावरणीय संतुलन के लिए चिंता का विषय है।
पौधारोपण के साथ पौधों को बचाने की भी जवाबदेही
हर साल सरकारी विभागों, स्थानीय निकायों और विभिन्न संस्थाओं द्वारा पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन अभियानों की सफलता केवल लगाए गए पौधों की संख्या से तय नहीं हो सकती। असली सवाल यह है कि कितने पौधे जीवित बचे, कितनों की नियमित देखभाल हुई और कितने पौधे विकसित होकर वृक्ष बन सके।
पर्यावरण संरक्षण पर खर्च की गई राशि और योजनाओं के परिणामों का मूल्यांकन पारदर्शी तरीके से होना चाहिए। इसके लिए पौधारोपण स्थलों का भौतिक सत्यापन, पौधों की जीवित रहने की दर का आकलन और देखभाल की जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है। यदि पौधे लगाने के बाद सिंचाई, सुरक्षा और रखरखाव की व्यवस्था नहीं होती, तो अभियान अपने उद्देश्य से भटक सकते हैं।
पुराने वृक्षों का संरक्षण भी जरूरी
महुआ, आम, जामुन और नीम जैसे वृक्ष ग्रामीण जीवन, जैव विविधता और स्थानीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। ये वृक्ष पक्षियों और अन्य जीवों को आश्रय देने के साथ मिट्टी के संरक्षण तथा स्थानीय पर्यावरण के संतुलन में भी भूमिका निभाते हैं।
ऐसे में केवल नए पौधे लगाने पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है। पुराने और स्वस्थ वृक्षों को बचाने, सूखते पेड़ों के कारणों का पता लगाने तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल प्रजातियों को बढ़ावा देने की जरूरत है। वृक्षों की कटाई, क्षति और संरक्षण से संबंधित नियमों का पालन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
तालाब, कुएं और नदियां बचेंगी, तभी मजबूत होगा जल सुरक्षा का आधार
जल संरक्षण की चुनौती केवल भूजल स्तर तक सीमित नहीं है। तालाबों का सिकुड़ना, कुओं का अनुपयोगी होना, जलधाराओं में अवरोध और जलस्रोतों के आसपास अतिक्रमण जैसी समस्याएं भी स्थानीय जल उपलब्धता को प्रभावित कर सकती हैं।
भूजल पर बढ़ती निर्भरता के बीच वर्षा जल संचयन और पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्जीवन महत्वपूर्ण हो जाता है। तालाबों की सफाई, जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण, वर्षा के पानी को जमीन में पहुंचाने की व्यवस्था और जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने के लिए योजनाबद्ध प्रयास किए जाने चाहिए।
संबंधित विभागों को जलस्रोतों की वर्तमान स्थिति का आकलन कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि किन क्षेत्रों में जलस्तर घट रहा है, कहां संरक्षण कार्यों की जरूरत है और इसके लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी
सड़कें, भवन, औद्योगिक गतिविधियां और आधुनिक सुविधाएं विकास के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, लेकिन विकास की योजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पर्याप्त जल, स्वच्छ हवा, उपजाऊ मिट्टी और हरित क्षेत्र मानव जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं हैं।
बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और जलसंकट जैसी चुनौतियों के बीच वैज्ञानिक आकलन तथा स्थानीय स्तर पर ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है। पर्यावरण संरक्षण को केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय योजनाओं की नियमित निगरानी और उनके परिणामों की समीक्षा की जानी चाहिए।
जिम्मेदारी तय हो, परिणाम भी सामने आएं
रीवा-मऊगंज सहित पूरे रीवा संभाग में पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी योजनाओं की समीक्षा के लिए प्रशासन को संबंधित विभागों से प्रगति रिपोर्ट लेने के साथ धरातलीय सत्यापन पर भी जोर देना चाहिए। वृक्षारोपण, जलस्रोतों के संरक्षण और भूजल संवर्धन से जुड़े कार्यों में कमियां सामने आने पर उन्हें दूर करने की समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जानी चाहिए।
आम नागरिकों की भागीदारी भी इस दिशा में महत्वपूर्ण है। पानी की बर्बादी रोकना, वर्षा जल संचयन अपनाना, पुराने वृक्षों की रक्षा करना और लगाए गए पौधों की देखभाल करना सामूहिक जिम्मेदारी है।
पर्यावरण संरक्षण की सफलता सरकारी अभिलेखों, घोषणाओं या आयोजनों से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से तय होनी चाहिए। आज जल और हरियाली को बचाने के लिए उठाए गए ठोस कदम ही आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का आधार बन सकते हैं।
