रीवा संभाग की सड़कों पर पसरा 'यमराज का तांडव': प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की बलि चढ़ती जिंदगियां

रीवा संभाग की सड़कों पर पसरा 'यमराज का तांडव': प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की बलि चढ़ती जिंदगियां

रीवा - रीवा संभाग की सड़कों का हाल इस समय अत्यंत भयावह है। केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं—चाहे वह प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना हो, नाबार्ड वित्तपोषित सड़कें हों या राष्ट्रीय राजमार्ग—इन सभी पर खर्च किए गए करोड़ों-अरबों रुपये का लाभ आम जनता को नहीं मिल पा रहा है। सड़कों का निर्माण कार्य मानकों के विपरीत है और इन पर व्याप्त अतिक्रमण मौत को सीधे आमंत्रण दे रहा है।

​राष्ट्रीय राजमार्गों की बदहाली और टोल वसूली का खेल

​राष्ट्रीय राजमार्ग 135 और 30, जो रीवा संभाग की जीवन रेखा हैं, लंबे समय से बनकर तैयार हैं और इन पर धड़ल्ले से टोल टैक्स की वसूली की जा रही है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन राजमार्गों पर आज भी आवश्यक सर्विस रोड का नामोनिशान नहीं है। डिवाइडर जगह-जगह से कटे हुए हैं, जो आए दिन भीषण दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं। सड़कों की पटरियों (शोल्डर) पर भारी वाहनों का अवैध पड़ाव, राजमार्ग को पार्किंग यार्ड बना देता है, जिससे गुजरने वाले छोटे वाहनों के लिए कोई स्थान नहीं बचता।

​परिवहन विभाग की उदासीनता और सुरक्षा के दावों की पोल

​सड़कों पर वाहनों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है, लेकिन परिवहन विभाग के पास न तो प्रशिक्षित चालकों का डेटा है और न ही लाइसेंसिंग प्रक्रिया में कोई गंभीरता। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, सड़क सुरक्षा के नियमों का मजाक उड़ाया जा रहा है। हेलमेट जैसे जीवन रक्षक उपकरण को केवल जुर्माने के 'लक्ष्य' के तौर पर देखा जाता है। इक्का-दुक्का घंटों के अभियान के बाद स्थिति वहीं ढाक के तीन पात हो जाती है। परिणाम यह है कि ग्रामीण हो या शहरी क्षेत्र, हेलमेट का उपयोग नगण्य है, जिससे मामूली दुर्घटनाएं भी जानलेवा साबित हो रही हैं।

​सड़कें बनीं मौत का सबब: प्रशासन की मौन स्वीकृति

​आज रीवा संभाग का शायद ही कोई ऐसा गांव या शहर बचा हो जहां सड़क हादसों ने किसी न किसी घर के चिराग न बुझाए हों। पिता का साया पुत्र से, भाई का बहन से और पति का पत्नी से छिन जाना अब एक सामान्य घटना बनकर रह गया है। सड़कों पर बेतरतीब घूमते आवारा पशु भी दोपहिया चालकों के लिए काल बने हुए हैं। ​गंभीर प्रश्न यह है कि पूर्व जिला कलेक्टरों और संभागीय आयुक्तों द्वारा समय-समय पर जारी किए गए सख्त आदेशों का क्या हुआ? सर्विस रोड क्यों नहीं बनी? डिवाइडर किसने काटे? अवैध पार्किंग वाले ढाबे बिना किसी रोक-टोक के कैसे संचालित हो रहे हैं?

​संरक्षण प्राप्त अधिकारी: जवाबदेही का अभाव

​इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि अधिकारी केवल मूकदर्शक बने हुए हैं। निजी सेवा शुल्क (सुविधा शुल्क) और सफेदपोश नेताओं या सत्ताधारी दल के संरक्षण के कारण किसी भी दोषी अधिकारी या ठेकेदार पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। प्रशासन का ध्यान केवल मुआवजा घोषणा तक सीमित है, जबकि दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए 'शून्य' प्रयास दिखाई दे रहे हैं।

समाज और प्रशासन को आत्मचिंतन की आवश्यकता

​रीवा की सड़कें लाल हो रही हैं और प्रशासनिक तंत्र अपनी तिजोरियां भरने में व्यस्त है। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी है। अब समय आ गया है कि समाज और शासन को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि आखिर ये दुर्घटनाएं कब रुकेंगी? क्या रीवा की जनता को सुरक्षित आवागमन का बुनियादी अधिकार भी नसीब नहीं होगा? पत्रकारिता का यह पवित्र धर्म है कि हम इस व्यवस्थागत भ्रष्टाचार और लापरवाही को पूरी कठोरता के साथ उजागर करें, ताकि भविष्य में और किसी का घर उजड़ने से बचाया जा सके।



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