
रीवा; सूखते जल स्रोत, घटते वृक्ष: रीवा-मऊगंज में भीषण गर्मी से हाहाकार, कागजों पर हरियाली और धरातल पर मरुस्थल
रीवा/मऊगंज - 'जल ही जीवन है' का नारा अब सिर्फ दीवारों पर लिखा एक जुमला मात्र रह गया है। आज हमारे जल सूत्र, जल स्रोत और सदियों पुराने जल सरोवर दम तोड़ रहे हैं, सूख रहे हैं। नतीजा? इंसान तो इंसान, बेजुबान पशु-पक्षी भी इस भीषण गर्मी में बूंद-बूंद पानी और छांव के लिए बेहाल हैं। जिस रफ़्तार और अनुपात से इस बार पारा चढ़ रहा है, उसने आने वाले भविष्य को बेहद डरावना और संकीर्ण बना दिया है।
आखिर क्यों सुलग रही है धरती?
दैनिक आज तक 24 ने पिछले वर्ष भी गर्मी के इन प्रमुख कारणों पर विस्तार से प्रकाश डाला था, लेकिन धरातल पर प्रशासन की नींद नहीं टूटी। आज स्थिति बद से बदतर हो चुकी है। इस जानलेवा गर्मी के मुख्य कारण बिल्कुल स्पष्ट हैं: घटती हरियाली और कंक्रीट का जाल: हरे-भरे वृक्षों की संख्या लगातार घट रही है। उनकी जगह कंक्रीट की सड़कों, पक्के मकानों और बहुमंजिला इमारतों ने ले ली है। वाहनों का उत्सर्जन: सड़कों पर दौड़ते वाहनों का धुआं और उनसे निकलने वाली गर्मी वातावरण को भट्टी बना रही है।
पहाड़ों और जंगलों पर अतिक्रमण: कभी मनुष्य की सबसे बड़ी बसाहट नदियों के किनारे हुआ करती थी, जहां प्रकृति का संतुलन था। लेकिन आबादी बढ़ने के साथ ही इंसानी लालच ने जंगलों और पहाड़ों को सिकोड़ना (संकीर्ण करना) शुरू कर दिया। पहाड़ों को बंजर किया जा रहा है और जंगलों को काटकर बड़े-बड़े कार्यालय और बस्तियां खड़ी की जा रही हैं।
'रिकॉर्ड' पर सुशोभित हरियाली, धरातल से विलुप्त
एक दौर था जब सड़कों की पटरियों के दोनों तरफ घने और छायादार वृक्ष राहगीरों को शीतलता देते थे। आज विकास के नाम पर ये वृक्ष धरातल से पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं और सिर्फ सरकारी फाइलों और रिकॉर्ड्स में ही सुशोभित हो रहे हैं। चौंकाने वाला सच: भीषण गर्मी और पानी की कमी के कारण प्रतिवर्ष रीवा और मऊगंज जिले में लाखों वृक्ष सूख कर ठूंठ बन रहे हैं।
दूसरी तरफ, तालाब, नदियां और पारंपरिक बावलियां सिमटती जा रही हैं। क्यूटन जैसे जल स्रोतों की संख्या कम हो रही है, जबकि निजी बोरिंग (बोरो) की संख्या में अंधाधुंध बढ़ोतरी हो रही है। इस अनियंत्रित दोहन के कारण पाताल का जलस्तर (वाटर लेवल) काफी नीचे खिसक चुका है। गर्मियों में शहर से लेकर गांवों तक कूलरों और अन्य विलासिताओं में पानी का बेतहाशा अपव्यय हो रहा है, जो इस संकट को और गहरा कर रहा है।
सरकारी योजनाएं: जनता की सहभागिता का अभाव और भ्रष्टाचार
इस पूरे जल और पर्यावरण संकट के पीछे कहीं न कहीं सरकार और उसके नुमाइंदों की नीतियां और उनकी घोर लापरवाही जिम्मेदार हैं। सरकारी योजनाओं के तहत वृक्षारोपण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये की राशि पानी की तरह बहाई जाती है। कागजों पर लाखों पौधे लगा दिए जाते हैं।
'दैनिक आज तक 24' का सीधा सुझाव और कड़वा सच:
यदि सरकार यही राशि और सरकारी योजनाओं के पौधे सीधे जनता को सौंप दे और प्रति वृक्ष के हिसाब से ग्रामीणों को जिम्मेदारी दे, तो आज ग्रामीण अंचलों के मार्ग भी हरे-भरे और जीवंत हो सकते हैं। लेकिन शासन-प्रशासन ऐसा नहीं करना चाहता।
वजह साफ है—सरकारी रिकॉर्ड पर वृक्षारोपण दिखाकर बजट ठिकाने लगाना आसान है। यदि आज कोई जिम्मेदार अधिकारी रीवा और मऊगंज के सरकारी रिकॉर्ड के पन्ने लेकर धरातल (जमीन) पर हकीकत जांचने पहुंचे, तो वहां वृक्षों की संख्या शून्य के बराबर दिखाई देगी।
समय रहते जागना होगा
पत्रकारिता का धर्म सचेत करना है। यदि आज भी सरकार और समाज इस भीषण त्रासदी को लेकर गंभीर नहीं हुए, जल स्रोतों को पुनर्जीवित नहीं किया गया और कंक्रीट के जंगल की जगह असली जंगलों को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के पास पछताने का समय भी नहीं बचेगा। कागजी हरियाली से धरती की प्यास नहीं बुझती, इसके लिए धरातल पर पसीना बहाना होगा।