| मौत से पहले का बयान’ बना न्याय की मजबूत कड़ी: रेंज में पुलिस अधिकारियों की विशेष कार्यशाला Aajtak24 News |
बिलासपुर - बिलासपुर रेंज में गंभीर अपराधों की विवेचना को अधिक सटीक और न्यायालय में सजा (Conviction Rate) की दर बढ़ाने के उद्देश्य से “मरणासन्न कथन (Dying Declaration)” विषय पर एक दिवसीय रेंज स्तरीय ऑनलाइन कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। यह कार्यशाला पुलिस महानिरीक्षक श्री राम गोपाल गर्ग (IPS) के मार्गदर्शन में आयोजित की गई, जिसमें बिलासपुर रेंज के सभी जिलों से लगभग 200 पुलिस अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल हुए। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य जांच प्रक्रिया में होने वाली छोटी-छोटी त्रुटियों को दूर करना और न्यायालय में मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत कर अपराधियों को सजा दिलाने की प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाना था।
कार्यशाला में शासकीय अधिवक्ता श्री रजनीकांत ठाकुर (मुंगेली) ने “मरणासन्न कथन” की कानूनी प्रक्रिया, उसकी प्रमाणिकता और विवेचना के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA), 2023 की धारा 26 के तहत मृत्युकालिक कथन एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विश्वसनीय साक्ष्य माना जाता है, विशेषकर जब इसे मजिस्ट्रेट द्वारा प्रश्नोत्तर रूप में दर्ज किया जाए।
डॉक्टर द्वारा पीड़ित की मानसिक स्थिति (Fit State of Mind) का प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य बताया गया, साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि इसकी अनुपस्थिति में कई मामलों में न्यायालय साक्ष्य को अमान्य कर सकता है। हाल के न्यायिक उदाहरणों का हवाला देते हुए विवेचकों को सावधानी बरतने की सलाह दी गई।
कार्यशाला में यह भी बताया गया कि विवेचना के दौरान डीएनए और भौतिक साक्ष्यों का सही संकलन, एफएसएल रिपोर्ट में रक्त समूह का मिलान, तथा आरोप पत्र (चालान) तैयार करते समय सटीकता अत्यंत आवश्यक है। एससी/एसटी एक्ट के मामलों में प्रारंभिक जांच में जातिगत शब्दों का स्पष्ट उल्लेख और गवाहों की न्यायालय में प्रस्तुति से पहले उचित विधिक तैयारी पर भी जोर दिया गया।
प्रशिक्षण के दौरान एक प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें अधिकारियों ने विवेचना में आने वाली व्यावहारिक समस्याएं साझा कीं। विशेषज्ञों ने उनके समाधान बताते हुए जांच प्रक्रिया को और प्रभावी बनाने के सुझाव दिए। कार्यशाला के समापन पर अधिकारियों ने उम्मीद जताई कि इस प्रशिक्षण से विवेचना की गुणवत्ता में सुधार होगा और न्यायालयों में सजा का प्रतिशत बढ़ाने में मदद मिलेगी।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- क्या जमीनी स्तर पर सभी विवेचकों को वास्तव में डायिंग डिक्लेरेशन दर्ज करने के लिए आवश्यक मेडिकल-लीगल प्रोटोकॉल की नियमित ट्रेनिंग मिल रही है, या यह ज्ञान केवल रेंज स्तर की कार्यशालाओं तक सीमित है?
- कई मामलों में साक्ष्य त्रुटियों के कारण केस कमजोर हो जाते हैं—क्या विभाग यह बता सकता है कि पिछले वर्षों में कितने मामलों में केवल तकनीकी खामियों के कारण सजा प्रभावित हुई है?
- क्या “Conviction Rate” बढ़ाने के दबाव में विवेचना की गुणवत्ता पर असर पड़ने की आशंका को रोकने के लिए कोई स्वतंत्र ऑडिट या रिव्यू सिस्टम लागू किया गया है?