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| रीवा-मऊगंज में अवैध 'पैकारी' का आतंक: ओवररेटिंग और मिलावट के खेल में 'सिस्टम' मौन, उठने लगी जांच की मांग Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - विंध्य क्षेत्र के रीवा और नवगठित मऊगंज जिले में इन दिनों आबकारी विभाग और शराब ठेकेदारों का 'गठबंधन' चर्चा का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक अवैध पैकारी (अवैध शराब दुकानों), निर्धारित दर से अधिक वसूली (ओवररेटिंग) और घटिया गुणवत्ता को लेकर जनता में भारी आक्रोश है। सरकार को सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला आबकारी विभाग आज आम जनता की सुरक्षा, संपत्ति और आबरू के लिए ही सवालिया निशान बन गया है।
7000 अवैध पैकारियां: ठेकेदारों के इशारे पर नाच रहा अमला!
सूत्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिल रही जानकारी के मुताबिक, रीवा और मऊगंज जिले में करीब 7000 अवैध पैकारी की दुकानें धड़ल्ले से संचालित हो रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ये अवैध दुकानें सीधे तौर पर मुख्य शराब ठेकेदारों के नियंत्रण में हैं। आरोप है कि आबकारी विभाग और स्थानीय पुलिस इस पूरे खेल में मूकदर्शक बनी हुई है। चर्चा तो यहां तक है कि लाखों रुपये का 'महीना' (सेवा शुल्क) और मुफ्त शराब के दम पर इन अवैध दुकानों को अप्रत्यक्ष रूप से खुली छूट दी गई है।
नियम ताक पर: न रेट लिस्ट, न सीसीटीवी
सरकारी नियमों के अनुसार शराब दुकानों पर रेट सूची चस्पा होना, आवक-वितरण और बिक्री रजिस्टर का दिनांक वार संधारण होना, तथा दुकान के आगे-पीछे सीसीटीवी कैमरे लगा होना अनिवार्य है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दुकानें तय समय से पहले खुलती हैं और देर रात तक चलती हैं, नियमों को ठेंगा दिखा दिया गया है।
आईजी के आदेश भी हुए बेअसर?
पूर्व में रीवा संभाग के आईजी द्वारा शराब दुकानों पर औचक छापेमारी की कार्रवाई की गई थी। साथ ही यह सख्त निर्देश भी दिए गए थे कि जिस बीट के अंतर्गत मेडिकल नशा या अवैध शराब बिकेगी, वहां के बीट प्रभारी (पुलिसकर्मी) पर कड़ी कार्रवाई होगी। लेकिन आज जमीनी हकीकत देखकर लगता है कि कागजी दावों के आगे जमीनी अमला ठेकेदारों की 'कठपुतली' बना हुआ है।
"इस बार नहीं थमेगी आवाज" : सोशल मीडिया पर महाअभियान
अक्सर देखा गया है कि हर साल जून के महीने के बाद अवैध पैकारी के खिलाफ खबरें चलना बंद हो जाती हैं। लेकिन इस बार आरटीआई कार्यकर्ताओं, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया ने ठान लिया है कि जब तक रीवा-मऊगंज की जनता को इस अभिशाप से मुक्ति नहीं मिलती, यह अभियान नहीं रुकेगा।
जांच की उठ रही बड़ी मांग:
स्थानीय प्रबुद्ध जनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि:
यदि सोशल मीडिया पर चल रही खबरें भ्रामक हैं, तो सरकार संबंधितों पर मुकदमा दर्ज करे।
यदि खबरें सच हैं (जो कि प्रत्यक्ष दिख रहा है), तो इस पूरे नेक्सस की टेक्निकल और उच्च स्तरीय जांच हो।
ठेकेदारों के कॉल डिटेल्स और बैंक खातों की जांच की जाए ताकि यह साफ हो सके कि किस अधिकारी और जिम्मेदार को कितनी 'सेवा शुल्क' पहुंचाई जा रही है।
