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| सहकारिता के 'गढ़' में मची खलबली, संजय पाण्डेय ने खोली व्यवस्था की पोल—मुख्यमंत्री तक पहुँचा विसंगतियों का 'कच्चा चिट्ठा' Aajtak24 News |
रीवा - विंध्य की धरती पर सहकारिता का ढांचा जिसे किसानों की रीढ़ माना जाता था, आज वही ढांचा 'सिस्टम के दीमकों' और 'कमीशनखोरों' की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। जिले की सहकारी समितियों में व्याप्त गहरी विसंगतियों और अन्नदाता के हक पर मारे जा रहे डाके के खिलाफ सहकार भारती ने अब निर्णायक 'रणभेरी' बजा दी है। प्रदेश उपाध्यक्ष ऋषि शुक्ला के कुशल मार्गदर्शन में सहकार भारती रीवा के विभाग प्रमुख संजय पाण्डेय ने मुख्यमंत्री और कमिश्नर के नाम एक ऐसा ज्ञापन सौंपा है, जिसने जिले के सहकारिता गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।
कुर्सी का 'मोह' और IBPS के साथ 'धोखा'
खबर की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली सच्चाई यह है कि बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान (IBPS) द्वारा कड़ी परीक्षा पास कर आए योग्य और नए प्रबंधकों को कार्यभार सौंपने में बैंक प्रबंधन 'सांप-सीढ़ी' का खेल खेल रहा है। विभाग प्रमुख संजय पाण्डेय ने सीधा और तीखा आरोप लगाया है कि कई समितियों में 'अपात्र' और 'अवैध' रूप से जमे कर्मचारी अपनी कुर्सियां छोड़ने को तैयार नहीं हैं। सवाल यह उठता है कि क्या बैंक प्रबंधन इन अवैध कब्जाधारियों को संरक्षण दे रहा है? पाण्डेय ने दो टूक मांग की है कि इन भ्रष्ट और अपात्र चेहरों को तत्काल बेदखल कर नए, पारदर्शी प्रबंधकों को कमान सौंपी जाए।
10% अंश पूंजी: किसान की मेहनत पर 'डाका' या 'मजबूरी'?
सहकार भारती ने समितियों के उस काले सच को भी उजागर किया है, जहां किसानों से अंश पूंजी के नाम पर 10% की अवैध वसूली की जा रही है। आरोप है कि यह भारी-भरकम राशि किसानों के कल्याण के बजाय 'निजी तिजोरियों' को भरने और 'बिचौलियों' के शौक पूरे करने में खर्च हो रही है। इस वित्तीय अनियमितता की उच्च स्तरीय जांच की मांग ने उन लोगों की नींद उड़ा दी है जो बरसों से किसानों के पसीने की कमाई पर ऐश कर रहे हैं।
प्रशासकों का 'एकाधिकार' और समितियों की 'बहाली'
रीवा जिले में एक और अजीबोगरीब खेल चल रहा है—'एक प्रशासक, अनेक समितियां'। जब एक ही व्यक्ति के पास कई महत्वपूर्ण समितियों का प्रभार होगा, तो पारदर्शिता और गुणवत्ता की उम्मीद बेमानी है। संजय पाण्डेय ने तर्क दिया है कि इसी 'एकाधिकार' के कारण वित्तीय अनुशासन टूट रहा है और समितियां निरंतर घाटे के गर्त में समाती जा रही हैं। यह सीधे तौर पर सरकारी खजाने और किसान के भरोसे के साथ खिलवाड़ है।
अन्नदाता की 'साँसें' अटकाती 31 मार्च की डेडलाइन
खेती-किसानी के वर्तमान हालातों और किसानों की आर्थिक तंगी को देखते हुए, संजय पाण्डेय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए KCC ऋण अदायगी की समय सीमा को 31 मार्च से बढ़ाकर 30 अप्रैल 2026 करने की पुरजोर पैरवी की है। इसके साथ ही, गेहूं उपार्जन केंद्रों की कम संख्या पर भी सवाल उठाए गए हैं। किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए कोसों दूर न भटकना पड़े, इसके लिए उपार्जन केंद्रों के विस्तार की मांग को प्रमुखता से रखा गया है।
मैदान में उतरे 'सहकार भारती' के योद्धा
ज्ञापन सौंपने के दौरान विभाग प्रमुख संजय पाण्डेय के साथ रीवा की जिला महिला प्रमुख नीतू पाठक, जिला संगठन प्रमुख समीर टंडन, और नगर अध्यक्ष पंकज पांडे सहित अन्य पदाधिकारियों की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया है कि यह लड़ाई अब रुकने वाली नहीं है।
संजय पाण्डेय का कड़ा संदेश - "सहकारिता का अर्थ 'साथ मिलकर कार्य करना' है, न कि 'साथ मिलकर लूटना'। यदि मुख्यमंत्री और प्रशासन ने इन न्यायोचित मांगों पर तत्काल संज्ञान लेकर दोषियों पर कार्रवाई नहीं की, तो सहकार भारती ईंट से ईंट बजाने के लिए तैयार है। हम चुप नहीं बैठेंगे, क्योंकि यह लड़ाई केवल व्यवस्था की नहीं, बल्कि रीवा के हर उस किसान के सम्मान की है जो कड़ाके की धूप में हमारे लिए अनाज उगाता है।
रीवा में सहकारिता विभाग के भीतर पनप रहा यह असंतोष आने वाले दिनों में बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। संजय पाण्डेय द्वारा उठाए गए मुद्दे केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि एक 'सफाई अभियान' की मांग करते हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इन 'सफेदपोश' गड़बड़ियों पर कब और कैसी कैंची चलाता है।
