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| शिक्षा या शोषण का तंत्र? रीवा और मऊगंज में निजी स्कूलों की मनमानी के आगे नतमस्तक प्रशासन Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - मध्य प्रदेश सरकार 'गुणवत्तापूर्ण शिक्षा' और 'अंतिम पंक्ति के व्यक्ति' के उत्थान के बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन रीवा और नवगठित मऊगंज जिले की जमीनी हकीकत इन दावों की कलई खोलती नजर आ रही है। यहाँ शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि एक ऐसा 'निजी बाज़ार' बन चुकी है जहाँ नियम-कायदे रसूखदारों की फाइलों में दम तोड़ रहे हैं।
सुरक्षा ताक पर: भेड़-बकरियों की तरह ढोए जा रहे छात्र परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवालिया निशान उन स्कूली वाहनों को देखकर लगता है, जिनमें क्षमता से तीन गुना अधिक बच्चों को ठूंस-ठूंस कर भरा जा रहा है। 4-सीटर वाहनों की सीटें निकालकर उनमें लकड़ी के फट्टे डालकर छात्रों को बैठाया जा रहा है। हर साल सत्र की शुरुआत में प्रशासन 'दिखावे' की चेकिंग करता है, लेकिन धरातल पर सुधार शून्य है। क्या विभाग किसी बड़ी अनहोनी के बाद ही नींद से जागेगा?
महंगी ड्रेस और कमीशन का 'अघोषित' सिंडिकेट निजी स्कूलों ने कमाई का नया तरीका ढूंढ निकाला है। अब स्कूल परिसर में किताबें या ड्रेस बेचने के बजाय 'प्राइवेट ठिकानों' को चिन्हित कर दिया जाता है। अभिभावकों को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूर किया जाता है कि वे उन्हीं दुकानों से ऊंचे दामों पर सामग्री खरीदें। हर साल ड्रेस का रंग-रूप बदलना और भारी भरकम बस्ते का बोझ मध्यमवर्गीय परिवारों की आर्थिक कमर तोड़ रहा है। प्रशासन के पास इन 'चिन्हित ठिकानों' की जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई न होना मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
आंकड़ों की बाजीगरी: सरकारी तंत्र की लाचारी यदि हम वर्ष 2010 से 2026 के बीच के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो स्थिति भयावह है। एक तरफ जहाँ सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की गई है, वहीं निजी स्कूलों की बाढ़ सी आ गई है। यह वृद्धि शिक्षा की गुणवत्ता के कारण नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की विफलता और निजी क्षेत्र के 'व्यापारिक प्रलोभन' के कारण है। सरकारी स्कूलों को बंद कर या उन्हें मर्ज कर निजी क्षेत्रों के लिए रास्ता साफ किया जा रहा है।
शिक्षकों का 'आधुनिक' शोषण हैरानी की बात यह है कि 'डिजिटल इंडिया' के दौर में भी ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों में शिक्षकों को ₹1500 से ₹3000 के मामूली मानदेय पर काम कराया जा रहा है। सबसे बड़ा 'खेल' वेतन भुगतान में है; सरकारी नियमों को ठेंगा दिखाते हुए आज भी वेतन बैंक खातों के बजाय 'नकद' (कैश) दिया जा रहा है। इससे न केवल शिक्षकों का शोषण हो रहा है, बल्कि पीएफ और अन्य सुविधाओं की चोरी भी की जा रही है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन इन निजी संस्थानों को बैंक के माध्यम से भुगतान करने के लिए अनिवार्य करेगा?
निष्कर्ष: क्या जागेगा प्रशासन? रीवा और मऊगंज की यह स्थिति बताती है कि शिक्षा का अधिकार (RTE) केवल कागजों तक सीमित है। यदि सरकार और जिला प्रशासन ने इन निजी संचालकों की मनमानी पर तुरंत लगाम नहीं लगाई, तो आने वाली पीढ़ियां केवल 'डिग्रियां' लेकर निकलेंगी, ज्ञान और संस्कार इस बाज़ारवाद की भेंट चढ़ जाएंगे।
