![]() |
| सत्ता का रसूख और बेबस प्रशासन: रीवा-मऊगंज में बेशकीमती सरकारी जमीनों पर 'सिस्टम' का डाका Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - विंध्य क्षेत्र के रीवा और नवगठित मऊगंज जिले में इन दिनों विकास के नाम पर एक ऐसा खतरनाक खेल खेला जा रहा है, जहाँ नियम-कायदे केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों और मुख्य मार्गों से लगी बेशकीमती सरकारी जमीनों पर एक सरकारी विभाग द्वारा दूसरे विभाग की भूमि पर बिना किसी वैध अनुमति के अतिक्रमण करने का सिलसिला तेज हो गया है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि नियमों के रक्षक कहे जाने वाले प्रशासनिक कार्यालय आज मूकदर्शक बनकर अपनी भूमिका को मौन स्वीकृति में बदल चुके हैं।
जिम्मेदार अधिकारियों के 'हैरान' करने वाले तर्क
हाल ही में जब मनगवां तहसील के एक जिम्मेदार राजस्व अधिकारी से इस बेतरतीब और अवैध निर्माण के बारे में सवाल किया गया, तो उनका जवाब तंत्र की संवेदनहीनता को दर्शाता था। अधिकारी ने दो टूक कहा—"शासकीय कार्यालय शासकीय भूमि पर बन रहा है, इसमें कोई दिक्कत नहीं है।" लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या भविष्य की जरूरतों को ताक पर रखकर बिना किसी मास्टर प्लान के किया जा रहा यह निर्माण सही है? रीवा शहर का उदाहरण सबके सामने है, जहाँ आज नए कार्यालयों के लिए जमीन ढूंढने से भी नहीं मिल रही। क्या प्रशासन मनगवां को भी उसी अराजक राह पर धकेल रहा है?
स्कूल और थाने की जमीन पर 'सत्ता' की नजर
मनगवां विधानसभा क्षेत्र में स्थिति और भी गंभीर हो चुकी है। यहाँ थाने और स्कूल के लिए आरक्षित भूमि पर पंचायत द्वारा अतिक्रमण करने की पुरजोर कोशिशें की जा रही हैं। हद तो तब हो गई जब भूमि परिवर्तन (Diversion) के लिए जिला कलेक्टर के न्यायालय में आवेदन तक लगा दिया गया। सूत्रों का कहना है कि 'माननीयों' की सिफारिश के आगे अधिकारी नियमों की फाइलें दबाए बैठे हैं। वहीं, विभागों के प्रमुख अपने पदों को बचाने के लालच में इस 'लूट' पर चुप्पी साधे हुए हैं, जिसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना होगा।
स्थगन आदेश का मजाक और रिकॉर्ड की बाजीगरी
क्षेत्र में कानून का डर इस कदर खत्म हो चुका है कि न्यायालय से 'स्टे' (स्थगन) मिलने के बावजूद निर्माण कार्य धड़ल्ले से जारी हैं। इसके पीछे रिकॉर्ड की एक बड़ी बाजीगरी भी शामिल है। साल 2004 के बाद हुए कंप्यूटराइज्ड खसरा फीडिंग में भारी खामियां हैं। कई शासकीय और निजी जमीनों के रिकॉर्ड से संबंधित नाम रहस्यमयी ढंग से 'विलुप्त' हो चुके हैं, जिसका सीधा फायदा भू-माफिया और भ्रष्ट तंत्र उठा रहा है। जिले में दो विशेष इंजीनियरों की जोड़ी भी खासी चर्चा में है, जो कथित तौर पर सरकारी जमीनों को चिन्हित कर वहां निर्माण कार्यों का 'विकास का ढिंढोरा' पीटकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रही है।
जनता का भय और विपक्ष की 'जुगलबंदी'
रीवा से शुरू हुई यह कब्जे की राजनीति अब मनगवां की ओर रुख कर चुकी है। आरोप है कि सत्ता और विपक्ष की 'अघोषित जुगलबंदी' ने शहर की जमीनों को संकुचित कर दिया है। रसूखदारों के दबाव में आम जनता इतनी भयभीत है कि कोई आवाज उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। यदि समय रहते इन 'नियोजित कब्जों' पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में सरकारी सेवाओं के विस्तार के लिए एक इंच जमीन भी शेष नहीं बचेगी।
