![]() |
| रामपुर मण्डल की कड़वी हकीकत: 'त्रिमूर्ति' के वर्चस्व में कराहता संगठन और हाशिए पर निष्ठावान कार्यकर्ता Aajtak24 News |
रीवा - भारतीय जनता पार्टी जहाँ एक ओर विश्व के सबसे बड़े कैडर-बेस संगठन होने और 'अंत्योदय' यानी अंतिम पंक्ति के व्यक्ति के उत्थान का दावा करती है, वहीं रीवा जिले की मनगँवा विधानसभा अंतर्गत रामपुर मण्डल से आती खबरें संगठन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़ा कर रही हैं। क्षेत्र में यह चर्चा अब सड़कों पर है कि जिले का 'नंबर 1' कहा जाने वाला यह मण्डल अब केवल तीन प्रभावशाली चेहरों की मर्जी और उनकी 'पसंद-नापसंद' का बंधक बनकर रह गया है।
मीडिया प्रभारी की उपेक्षा: रसूख या सोची-समझी साजिश? ताजा विवाद हाल ही में आयोजित पार्टी के प्रशिक्षण शिविर से उपजा है। इस शिविर में सोशल मीडिया सत्र के दौरान प्रदेश सह-मीडिया प्रभारी डॉ. अनिल पटेल की गरिमामयी उपस्थिति रही और कार्यक्रम की अध्यक्षता लालजी पाण्डेय ने की। विडंबना देखिए कि जिस सत्र का केंद्र बिंदु ही मीडिया और संवाद था, वहाँ मण्डल के मीडिया प्रभारी को ही पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मंच से बोलने वाले वक्ताओं ने जानबूझकर मीडिया प्रभारी का नाम तक नहीं लिया। यह उपेक्षा की वह पराकाष्ठा है, जहाँ संगठन के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के अस्तित्व को ही नकारने की कोशिश की जा रही है।
OBC कार्ड और 'तीन रसूखदारों' का सिंडिकेट मण्डल के भीतर दबी जुबान में अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या पिछड़ा वर्ग (OBC) से आने वाले सक्रिय कार्यकर्ताओं को जानबूझकर सम्मान के योग्य नहीं समझा जाता? कार्यकर्ताओं का आरोप है कि रामपुर मण्डल में एक विशेष 'गुट' या तीन लोगों की चौकड़ी ने संगठन को अपनी निजी जागीर बना लिया है। यहाँ पार्टी की 'रीति-नीति' और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के बजाय इन तीन रसूखदारों का 'वीटो' चलता है। जो कार्यकर्ता दिन-रात पार्टी के कार्यक्रमों को सोशल मीडिया से लेकर धरातल तक पहुँचाने में पसीना बहाते हैं, उन्हें सार्वजनिक मंचों पर पहचान न देना सीधे तौर पर संगठन के अनुशासन को चुनौती है।
असंतोष की आग: घुटन महसूस कर रहे निष्ठावान कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविरों का मुख्य उद्देश्य कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरना और उन्हें एकजुट करना होता है, लेकिन रामपुर मण्डल में यह आयोजन विवादों और 'ईगो-क्लैश' का प्रतीक बन गया है। निष्ठावान कार्यकर्ताओं में इस भेदभावपूर्ण व्यवहार को लेकर भारी असंतोष और घुटन का माहौल है। सवाल यह है कि क्या जिला और प्रदेश नेतृत्व इस 'तीन सदस्यीय वर्चस्व' से अनभिज्ञ है? या फिर रसूख के आगे पद की गरिमा को बौना मान लिया गया है?
समय रहते चेतने की जरूरत यदि समय रहते रामपुर मण्डल के इस 'सिंडिकेट' पर अंकुश नहीं लगाया गया और पिछड़ा वर्ग के सक्रिय कार्यकर्ताओं का मनोबल इसी तरह गिराया जाता रहा, तो 'आदर्श मण्डल' का खिताब केवल कागजी दस्तावेजों तक सिमट जाएगा। संगठन की मजबूती गुटबाजी में नहीं, बल्कि हर छोटे-बड़े कार्यकर्ता के सम्मान में निहित है। अब देखना यह है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस गुटबाजी को खत्म करने के लिए क्या कदम उठाता है।
