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| सहकारिता का 'कुबेर' सिंडिकेट: मऊगंज में एक अधिकारी के पास 16 समितियों की कमान Aajtak24 News |
रीवा - मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में सहकारिता विभाग इन दिनों सेवा और सहयोग के बजाय 'भाई-भतीजावाद' और 'वित्तीय बंदरबांट' का सबसे बड़ा अड्डा बन चुका है। रीवा और मऊगंज जिलों में सहकारिता के नाम पर एक ऐसा 'सिंडिकेट' सक्रिय है, जिसने सरकारी नियमों को ताक पर रखकर समितियों को अपनी जागीर बना लिया है। आलम यह है कि जिले की कई सहकारी समितियां वित्तीय कुप्रबंधन के कारण दिवालिया होने की कगार पर हैं, लेकिन इसके बावजूद जिम्मेदार कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
अनिल गुप्ता: एक 'सुपर' अधिकारी, 16 प्रभार और 11 खरीदी केंद्र
भ्रष्टाचार के इस महाजाल में सबसे चौंकाने वाला नाम मऊगंज से सामने आया है। सहकारिता उप-निरीक्षक अनिल गुप्ता वर्तमान में विभाग के लिए किसी 'सुपरमैन' से कम नहीं हैं। उनके पास न केवल सहकारिता निरीक्षक का दायित्व है, बल्कि वे 16 सोसायटियों के प्रशासक भी बने हुए हैं। हद तो तब हो जाती है जब पता चलता है कि उनके पास फूड विभाग का कार्य और हनुमना के फूड इंस्पेक्टर का भी प्रभार है। सवाल यह उठता है कि क्या मऊगंज जिले में अधिकारियों का इतना अकाल है कि एक ही व्यक्ति को 16 समितियों की जिम्मेदारी सौंप दी गई? इन 16 समितियों में से 11 समितियां सीधे तौर पर धान और गेहूं खरीदी से जुड़ी हैं, जहाँ करोड़ों रुपये का लेन-देन होता है। यह केवल पद का मोह नहीं, बल्कि एक गहरे वित्तीय स्वार्थ की ओर इशारा करता है।
'हितों का टकराव' और ऑडिट का मजाक
रीवा और मऊगंज में "हितों के टकराव" (Conflict of Interest) का खुला नंगा नाच चल रहा है। जिले की 146 समितियों में से 72 पर सहकारिता निरीक्षकों ने प्रशासक के रूप में कब्जा कर रखा है। नियमतः ऑडिट और निरीक्षण का कार्य निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन यहाँ खेल उल्टा है—एक निरीक्षक दूसरे निरीक्षक की समिति का ऑडिट करता है। यानी, "तुम मेरी फाइल दबाओ, मैं तुम्हारी फाइल दबाऊंगा।" इसी आपसी तालमेल के कारण धान-गेहूं खरीदी में होने वाली 'खयानत' (गबन) कभी सामने नहीं आती और सोसाइटियां लगातार घाटे में जाकर अपनी आय खो रही हैं।
अधिकारियों की 'कृपा' और करीबियों की 'बढ़ती संपत्ति'
क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि जिन समितियों का प्रभार इन रसूखदार अधिकारियों के पास है, उनकी वित्तीय स्थिति तो जर्जर हो चुकी है, लेकिन इन अधिकारियों के सगे-संबंधियों और करीबियों की संपत्ति में रातों-रात बेतहाशा वृद्धि हो रही है। बिना किसी ठोस उत्पादन या व्यवसाय के, इन 'खास' लोगों के पास लग्जरी गाड़ियां और आलीशान मकान कहाँ से आ रहे हैं? यह जांच का एक बड़ा विषय है।
ठोस कार्रवाई की मांग: उधड़ेंगी भ्रष्टाचार की परतें
सहकारिता के इस मकड़जाल को तोड़ने के लिए अब मांग उठने लगी है। प्रबुद्ध नागरिकों और किसानों का कहना है कि यदि एंटी-करप्शन ब्यूरो या किसी निष्पक्ष केंद्रीय एजेंसी से इन अधिकारियों और उनके परिजनों की संपत्ति की जांच कराई जाए, तो करोड़ों का घोटाला सामने आना तय है।
प्रमुख मांगें:
सार्वजनिक हो आय-व्यय: सभी समितियों की पिछले तीन वर्षों की आय और व्यय का विवरण सार्वजनिक किया जाए।
एक व्यक्ति-एक पद: प्रशासन में पारदर्शिता लाने के लिए 'एक व्यक्ति, एक पद' का सिद्धांत सख्ती से लागू हो।
निष्पक्ष ऑडिट: प्रशासकों के बजाय स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट या अन्य जिले की टीम से ऑडिट कराया जाए।
परिजनों की संपत्ति जांच: रसूखदार अधिकारियों के करीबियों की बेनामी संपत्ति की जांच हो।
रीवा और मऊगंज का सहकारिता विभाग आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहाँ भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं। यदि सरकार ने समय रहते इन 'प्रभार के सौदागरों' पर नकेल नहीं कसी, तो किसानों की मेहनत की कमाई डकारने वाला यह सिंडिकेट पूरे तंत्र को खोखला कर देगा। #मऊगंज_सवाल_करता_है कि आखिर कब तक एक ही अधिकारी के कंधों पर 16 समितियों का बोझ और भ्रष्टाचार का कवच बना रहेगा?
