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| सिस्टम की 'कैंसर' से लड़ता एक बुजुर्ग: मऊगंज में पटवारी ने रीवा में बैठकर लिख डाली 'झूठी' रिपोर्ट Aajtak24 News |
मऊगंज/नईगढ़ी - मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार जहाँ 'सुशासन' और 'अंत्योदय' (अंतिम व्यक्ति का उदय) का दावा कर रही है, वहीं मऊगंज जिले के नईगढ़ी तहसील के कशियार गांव से एक ऐसा मामला सामने आया है जो इन दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है। यहाँ एक 80 वर्षीय कैंसर पीड़ित बुजुर्ग को न्याय के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, क्योंकि क्षेत्र के पटवारी ने अपनी 'जादुई कलम' से बिना मौके पर जाए एक ऐसी रिपोर्ट तैयार कर दी है जिसने पूरे परिवार की नींद उड़ा दी है।
80 किमी दूर रीवा से चल रहा 'मऊगंज का हल्का'
ग्राम कशियार निवासी रामशिरोमणि पाण्डेय ने हल्का पटवारी सुभाष चंद्र त्रिपाठी पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री से लेकर जिला कलेक्टर तक गुहार लगाई है। शिकायत में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पटवारी महोदय अपने आवंटित क्षेत्र (हल्के) में रहने के बजाय, वहां से करीब 80 किलोमीटर दूर पड़ोसी जिले रीवा में निवास करते हैं। आरोप है कि पटवारी ने खसरा नंबर 453 से जुड़े एक जमीन और पारिवारिक विवाद में मौके पर जाए बिना, केवल अपनी मर्जी और गलत तथ्यों के आधार पर एक 'झूठा प्रतिवेदन' (रिपोर्ट) तैयार कर दिया।
कैंसर पीड़ित बुजुर्ग पर 'मानसिक प्रहार'
इस मामले का सबसे हृदय विदारक पहलू यह है कि शिकायतकर्ता के पिता 80 वर्ष की आयु में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जंग लड़ रहे हैं। रामशिरोमणि पाण्डेय का कहना है कि पटवारी की इस गलत और मनगढ़ंत रिपोर्ट ने उनके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा को धूल धूसरित कर दिया है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे बुजुर्ग पिता इस अन्याय से मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुके हैं। पटवारी की एक गलत रिपोर्ट ने इस परिवार को गहरे तनाव और कानूनी पेचीदगियों के जाल में धकेल दिया है।
राजस्व विभाग की 'विलुप्त' कार्यप्रणाली पर सवाल
पटवारी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों का 'भाग्यविधाता' माना जाता है। लेकिन जब ये अधिकारी अपने क्षेत्र से हफ्तों गायब रहते हैं और एयरकंडीशन कमरों में बैठकर रिपोर्ट तैयार करते हैं, तो आम आदमी की जिंदगी तबाह हो जाती है। किसान अपनी पूरी उम्र और पीढ़ियां राजस्व अदालतों की चौखट पर माथा टेकते-टेकते गुजार देते हैं।
डिजिटल हाजिरी की उठ रही मांग
इस प्रकरण के बाद अब मऊगंज और रीवा संभाग में यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि जिस तरह शिक्षा विभाग में शिक्षकों की 'मोबाइल ऐप' के माध्यम से स्कूल परिसर के अंदर अटेंडेंस अनिवार्य की गई है, उसी तरह राजस्व, सहकारिता और महिला बाल विकास जैसे विभागों में भी 'जियो-फेंसिंग' आधारित अटेंडेंस लागू होनी चाहिए। ताकि अधिकारी अपने मुख्यालय पर मौजूद रहें और जनता को उनके कार्यों के लिए भटकना न पड़े।
