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| रीवा-मऊगंज में फिर सजेगी 'जाम की महफिल': अप्रैल से 'दारू साम्राज्य' का नया अध्याय, क्या तंत्र फिर मूंद लेगा आंखें? Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - जैसे-जैसे कैलेंडर के पन्ने पलट रहे हैं और अप्रैल 2026 का महीना नजदीक आ रहा है, रीवा और मऊगंज जिलों में 'दारू साम्राज्य' के नए दौर की आहट सुनाई देने लगी है। आबकारी विभाग के नए ठेकों और दुकानों के आवंटन के साथ ही एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार हो रहा है, जिसमें चंद रसूखदारों की तिजोरियां तो भरेंगी, लेकिन आम आदमी का परिवार और उसकी पैतृक संपत्ति स्वाहा हो जाएगी।
दिखावे की समाजसेवा और पत्रकारिता का 'मौसमी' खेल: हैरानी की बात यह है कि हर साल अप्रैल और मई के महीनों में तथाकथित समाजसेवी और कुछ 'यूट्यूबर' पत्रकार अचानक सक्रिय हो जाते हैं। शासन-प्रशासन की कमियां गिनाई जाती हैं, विरोध के स्वर बुलंद होते हैं, लेकिन जैसे ही जुलाई का महीना आता है और 'सेटिंग' का खेल मुकम्मल होता है, ये तमाम खबरें और विरोध के वीडियो गायब हो जाते हैं। न यूट्यूब पर दारू की खबरें दिखती हैं और न ही सड़कों पर विरोध। यह 'चुप्पी' ही इस अवैध और अनैतिक व्यापार की सबसे बड़ी ऑक्सीजन है।
अवैध व्यापार का 'त्रिभुज': नेता, अधिकारी और ठेकेदार: इस काले कारोबार के पीछे एक गहरा गठजोड़ है। चाहे सरकार किसी की भी रही हो, शराब के इन अड्डों पर अधिकांश वही चेहरे नजर आते हैं जिन्होंने राजनीति का चोला ओढ़ रखा है या जो गांव के 'रसूखदार' हैं। अरबों रुपये का यह खेल अधिकारियों के बंगलों से लेकर नेताओं के ड्राइंग रूम तक फैला है। आबकारी विभाग अपनी आंखें मूंदकर बैठा रहता है और पुलिस विभाग के लिए यह 'अतिरिक्त कमाई' का जरिया बन जाता है।
गांव-गांव में जहर की खेप: आज स्थिति यह है कि जिले की ऐसी कोई ग्राम पंचायत नहीं बची, जहां दो से तीन प्रकार की शराब की दुकानें या अवैध 'अहाते' संचालित न हो रहे हों। शहर से ज्यादा जहर गांवों की रगों में घोला जा रहा है। इसका सबसे बुरा असर कानून व्यवस्था पर पड़ रहा है। नशा ही वह बीज है जिससे अपराध की फसल लहलहाती है। नशा करने वाला व्यक्ति अपनी जरूरत पूरी करने के लिए अपराध के दलदल में धंसता चला जाता है।
बर्बाद होता परिवार और भविष्य: इस व्यापार का सबसे वीभत्स चेहरा वह है जहाँ एक मजदूर अपनी पूरी दिहाड़ी दारू की दुकान पर लुटा देता है। परिवार उजड़ रहे हैं, बच्चों की शिक्षा ठप है और लोग असाध्य बीमारियों की चपेट में आकर कम उम्र में ही 'भगवान को प्यारे' हो रहे हैं। क्या एक सभ्य समाज अपनी बर्बादी का यह तमाशा मूकदर्शक बनकर देखता रहेगा?
