सहकारिता के नाम पर 'सफेद हाथी' बनीं सोसायटियाँ; अरबों के धान खेल में किसान बेहाल, प्रबंधक मालामाल Aajtak24 News

सहकारिता के नाम पर 'सफेद हाथी' बनीं सोसायटियाँ; अरबों के धान खेल में किसान बेहाल, प्रबंधक मालामाल Aajtak24 News 

मऊगंज  - मऊगंज जिले में धान खरीदी सीजन 2025-26 बीत जाने के बाद भी केंद्रों का पूर्ण मूल्यांकन न होना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जहाँ एक ओर सरकारी दस्तावेजों में खरीदी के बड़े-बड़े आंकड़े पेश किए जा रहे हैं, वहीं धरातल पर वास्तविक किसान और सहकारी समितियां बदहाली की कगार पर पहुँच चुकी हैं। अब जब गेहूं, सरसों और मसूर की खरीदी का समय सिर पर है, तब पिछले सीजन का हिसाब न होना किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा कर रहा है।

भ्रष्टाचार की 'दुधारू गाय' बनीं समितियां

सहकारिता का मूल उद्देश्य किसानों को संबल देना था, लेकिन आज 'पूर्ण सहकारी सेवा सहकारी मर्यादित समितियां' भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी हैं। करोड़ों-अरबों रुपये के धान के इस खेल में निजी गोदामों की आय तो बढ़ रही है, लेकिन समितियों का 'क्रेडिट' लगातार गिर रहा है। बड़ा सवाल यह है कि सोसायटियों में हुई ऋण माफी की वास्तविक स्थिति क्या है? खरीदी का प्रासंगिक व्यय और कमीशन का पैसा आखिर किसकी जेब में गया? प्रशासन के पास इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं है कि कितनी समितियां 'क्रेडिट' में हैं और कितनी 'डिफाल्टर' हो चुकी हैं।

दस्तावेजों की 'रहस्यमयी' गुमशुदगी

पारदर्शिता के अभाव में समितियों का संचालन अंधकार में है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई सोसायटियों के महत्वपूर्ण दस्तावेज जैसे हिस्सा रजिस्टर, एजेंडा रजिस्टर और प्रस्ताव रजिस्टर अब धरातल से लगभग गायब हो चुके हैं। अभिलेखों की यह 'विलुप्ति' महज़ इत्तेफाक नहीं, बल्कि ऑडिट और जांच से बचने की एक पुरानी रवायत जान पड़ती है। बिना रिकॉर्ड के इन समितियों का मूल्यांकन कैसे संभव होगा, यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है।

दागी प्रबंधकों की वापसी: संस्थागत हार का कारण

वर्तमान में समितियों में एक नया और खतरनाक खेल शुरू हुआ है। पूर्व के दागी, विवादित और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे विक्रेताओं को प्रशासकों द्वारा फिर से 'प्रबंधक' का महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिया गया है। ये कार्यवाहक प्रबंधक संस्था के हितों की रक्षा करने के बजाय केवल अपनी व्यक्तिगत तिजोरियां भरने में लगे हैं। यही कारण है कि न्यायालयों में लंबित संस्था के प्रकरणों की सही पैरवी नहीं की जा रही है, जिससे सोसायटियां आर्थिक और कानूनी मोर्चों पर लगातार हार रही हैं।

प्रशासन से तीखे सवाल

जनता और किसान अब प्रशासन से सीधा जवाब मांग रहे हैं:

  1. पुराने और दागी कर्मचारियों को दोबारा प्रबंधक की कुर्सी किस आधार पर सौंपी गई?

  2. गायब हो चुके महत्वपूर्ण दस्तावेजों की रिकवरी के लिए अब तक क्या ठोस कार्रवाई हुई?

  3. धान खरीदी के बाद हुए वित्तीय नुकसान की भरपाई और इसकी जिम्मेदारी किसकी तय की जाएगी?

क्या सरकार और सहकारिता विभाग कभी इन समितियों का निष्पक्ष मूल्यांकन कराएगा? या फिर 'दिखावे' की योजनाओं के नाम पर किसानों का हक यूँ ही मारा जाता रहेगा? मऊगंज की जनता अब खोखले वादों नहीं, बल्कि धरातल पर सुधार और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की उम्मीद कर रही है।

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