रीवा-मऊगंज में राशन माफिया का तांडव: गरीबों के पेट पर डाका, ₹7000 में बिक रही 'गरीबी' और ₹5000 का 'पटवारी शुल्क' Aajtak24 News

रीवा-मऊगंज में राशन माफिया का तांडव: गरीबों के पेट पर डाका, ₹7000 में बिक रही 'गरीबी' और ₹5000 का 'पटवारी शुल्क' Aajtak24 News

रीवा - मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में भ्रष्टाचार का एक ऐसा "घुन" लगा है जो गरीबों के हक के अनाज को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है। रीवा और मऊगंज जिलों में 'प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना' और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) अब जनसेवा के बजाय भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा जरिया बन चुकी है। यहाँ गरीबों को मिलने वाला नि:शुल्क राशन कागजों पर तो बंट रहा है, लेकिन असलियत में वह बिचौलियों और भ्रष्ट अधिकारियों की तिजोरियों में जमा हो रहा है।

बायोमेट्रिक का खेल: अंगूठा लगा, पर अनाज कहाँ गया?

ग्रामीण अंचलों से आ रही शिकायतें रोंगटे खड़े करने वाली हैं। उचित मूल्य की दुकानों (सोसायटियों) पर सेल्समैनों ने धांधली का नया तरीका निकाला है। हितग्राहियों को बुलाकर उनके बायोमेट्रिक (अंगूठे) तो हर महीने लगवा लिए जाते हैं, जिससे पोर्टल पर वितरण 'सफल' दिखाई दे। लेकिन जब अनाज देने की बात आती है, तो पिछले दो-तीन महीनों में केवल एक महीने का राशन थमा दिया जाता है। शेष अनाज कहाँ गायब हो जाता है, इसका जवाब न तो विक्रेता के पास है और ना ही खाद्य विभाग के पास। जब से राशन पूरी तरह नि:शुल्क हुआ है, तब से स्टॉक और बारदानों की जांच का सिस्टम ही जैसे ठप हो गया है।

बीपीएल कार्ड का 'रेट कार्ड': सेवा शुल्क के नाम पर खुली लूट

भ्रष्टाचार केवल राशन की दुकान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें राजस्व विभाग के गलियारों तक गहरी धंसी हुई हैं। सबसे चौंकाने वाला खुलासा बीपीएल (गरीबी रेखा) कार्ड को लेकर हुआ है। आरोप है कि एक नया बीपीएल कार्ड बनवाने के लिए पटवारी और संबंधित क्लर्कों ने ₹5000 का 'अघोषित सेवा शुल्क' तय कर रखा है। यदि कोई गरीब सीधे दफ्तर नहीं पहुँच पाता और बिचौलियों का सहारा लेता है, तो यह रेट ₹7000 तक पहुँच जाता है। विडंबना देखिए कि जिस व्यक्ति के पास ₹7000 देने की क्षमता है, वही व्यक्ति 'गरीब' घोषित किया जा रहा है।

80% अपात्रों का कब्जा: कागजों में 'अमीर' हुए गरीब

क्षेत्र में हुए एक अनौपचारिक सर्वे और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, वर्तमान में बने लगभग 80 प्रतिशत बीपीएल कार्ड शासन के मापदंडों पर खरे नहीं उतरते। रसूखदार और संपन्न लोग, जिनके पास पक्के मकान और गाड़ियां हैं, वे भ्रष्टाचार के दम पर कार्ड बनवाकर सरकारी राशन डकार रहे हैं। दूसरी ओर, झोपड़ियों में रहने वाले वास्तविक पात्र गरीब कागजों की खानापूर्ति और रिश्वत न दे पाने के कारण दर-दर भटक रहे हैं।

प्रशासनिक जांच या महज खानापूर्ति?

ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि प्रशासन द्वारा की जाने वाली जांच केवल दिखावा है। अधिकारियों की टीम आती है, चाय-नाश्ता करती है और 'सब ठीक है' की रिपोर्ट सौंपकर चली जाती है। जब तक पात्र और अपात्र हितग्राहियों का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) घर-घर जाकर नहीं किया जाएगा, तब तक यह लूट जारी रहेगी।

निष्कर्ष: सिस्टम को बदलने की दरकार

रीवा और मऊगंज में गरीबों के हक पर पड़ा यह डाका सरकार की छवि को धूमिल कर रहा है। जरूरत है कि संभाग के वरिष्ठ अधिकारी इन शिकायतों पर संज्ञान लें और उन भ्रष्ट पटवारियों व सेल्समैनों पर नकेल कसें जो गरीबों की थाली छीनकर अपनी जेबें भर रहे हैं।

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