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| रीवा-मऊगंज की सहकारी समितियों में न्यायालयीन पैरवी पर सवाल, लाखों की वसूली अटकने की आशंका |
रीवा/मऊगंज। रीवा एवं नवगठित मऊगंज जिले में संचालित सहकारी समितियों के विवादित न्यायालयीन प्रकरणों को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप हैं कि कुछ मामलों में संबंधित समिति प्रबंधकों द्वारा सहकारिता न्यायालय में संस्था का पक्ष प्रभावी ढंग से नहीं रखा गया और न ही निर्धारित समय-सीमा में अपील की गई। इसके चलते संस्थाओं के हित प्रभावित होने तथा कथित गबन की राशि की वसूली में देरी होने की आशंका जताई जा रही है। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो इससे सहकारी संस्थाओं की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
न्यायालयीन प्रकरणों में लापरवाही के आरोप
विभागीय कर्मचारियों से जुड़े सूत्रों के अनुसार, कुछ सहकारी समितियों में कथित वित्तीय अनियमितताओं और गबन की राशि की वसूली से संबंधित मामले सामने आने की बात कही जा रही है। आरोप है कि कुछ प्रकरणों में संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई होने या उनके सेवा से पृथक होने के बाद भी वसूली की प्रक्रिया प्रभावी ढंग से आगे नहीं बढ़ाई गई।
इस पूरे मामले में यह सवाल उठ रहा है कि जब किसी न्यायालयीन प्रकरण में संस्था का आर्थिक हित जुड़ा होता है, तब उसकी ओर से प्रभावी पैरवी करना, जरूरी दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत करना तथा समय-सीमा के भीतर अपील करना संबंधित जिम्मेदारों का महत्वपूर्ण दायित्व है। यदि इन प्रक्रियाओं में लापरवाही होती है, तो संस्था को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
कथित गबन की राशि की वसूली पर सवाल
सूत्रों के अनुसार, रीवा जिले में ऐसे कई मामले होने की बात कही जा रही है, जिनमें विक्रेताओं अथवा अन्य संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध कथित गबन के प्रकरणों के बावजूद राशि की वसूली को लेकर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने के आरोप हैं। कुछ मामलों में संबंधित कर्मचारी सेवा से पृथक हो चुके हैं, जबकि कथित गबन की राशि की वसूली की स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है।
ऐसे में यह जांच जरूरी है कि संबंधित प्रकरणों में कितनी राशि की वसूली के आदेश जारी हुए, कितनी राशि वास्तव में वसूल की गई और कितने मामले लंबित हैं। साथ ही यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि किन प्रकरणों में अपील की गई और कहां आवश्यक दस्तावेज, साक्ष्य अथवा गवाही प्रस्तुत करने में कमी रही।
प्रशासकों की नियुक्ति के बाद संस्थाओं के कामकाज पर भी सवाल
सहकारी समितियों में प्रशासकों की नियुक्ति के बाद संस्थाओं के कामकाज और न्यायालयीन मामलों की निगरानी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप हैं कि कुछ संस्थाओं में नियमित प्रशासनिक निगरानी और लंबित प्रकरणों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।
यह जांच का विषय है कि संबंधित संस्थाओं में प्रशासकों की नियुक्ति के बाद न्यायालयीन प्रकरणों की समीक्षा किस स्तर पर की गई और लंबित मामलों में संस्था के हितों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए। यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
विभागीय जवाबदेही तय करने की मांग
सहकारिता विभाग से जुड़े मामलों में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। यदि किसी प्रकरण में संस्था की ओर से समय पर अपील नहीं की गई या न्यायालय में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है।
मांग उठाई जा रही है कि सभी विवादित प्रकरणों की फाइलों, न्यायालयीन आदेशों, विभागीय जांच रिपोर्ट और वसूली से संबंधित अभिलेखों की समीक्षा की जाए। इससे यह पता चल सकेगा कि किन मामलों में वास्तविक लापरवाही हुई और कहां किसी अन्य कारण से वसूली की प्रक्रिया प्रभावित हुई है।
संभागीय आयुक्त और कलेक्टर से निष्पक्ष जांच की मांग
रीवा संभाग के संभागीय आयुक्त तथा रीवा और मऊगंज के जिला कलेक्टर से मांग की जा रही है कि सहकारी समितियों के विवादित न्यायालयीन प्रकरणों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। विशेष रूप से उन मामलों की समीक्षा होनी चाहिए, जिनमें कथित गबन की राशि की वसूली लंबित है, संस्था की ओर से समय पर अपील नहीं किए जाने की शिकायत है अथवा आवश्यक साक्ष्य और दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करने के आरोप लगाए गए हैं।
जांच के दौरान संबंधित समिति प्रबंधकों, प्रशासकों और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा की जानी चाहिए। यदि अभिलेखों से लापरवाही, नियमों के उल्लंघन या संस्था को नुकसान पहुंचाने की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
आधिकारिक पक्ष और अभिलेखों की पुष्टि जरूरी
इस संबंध में समाचार तैयार किए जाने तक संबंधित विभाग की ओर से आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी। फिलहाल सामने आई बातें विभागीय कर्मचारियों से जुड़े सूत्रों पर आधारित हैं। संबंधित समितियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का पक्ष तथा न्यायालयीन अभिलेखों की पुष्टि होना शेष है।
सहकारी समितियां किसानों और ग्रामीण हितग्राहियों से जुड़ी महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं। ऐसे में उनके धन की सुरक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और न्यायालयीन मामलों में प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना जरूरी है। अब देखना होगा कि प्रशासन इन शिकायतों की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाता है या नहीं, ताकि कथित गबन की राशि की वसूली और जिम्मेदार व्यक्तियों की जवाबदेही को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सके।
