| बस्तर; सुशासन तिहार’ बना राहत का मंच: खोरखोसा में योजनाओं की बरसात, ग्रामीणों की भीड़ उमड़ी |
जगदलपुर - जिले के विकासखंड बस्तर अंतर्गत ग्राम खोरखोसा में बुधवार को आयोजित सुशासन तिहार शिविर ग्रामीणों के लिए सीधे लाभ और त्वरित समाधान का बड़ा मंच साबित हुआ। शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के उद्देश्य से आयोजित इस शिविर में बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचे और अपनी समस्याएं एवं आवेदन अधिकारियों के सामने रखे। शिविर में कई मामलों का मौके पर ही निराकरण किया गया, जबकि शेष आवेदनों के समयबद्ध समाधान का आश्वासन दिया गया। प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इस तरह के शिविरों का उद्देश्य केवल आवेदन लेना नहीं, बल्कि वास्तविक समय में समाधान सुनिश्चित करना है।
इस अवसर पर जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की मौजूदगी में विभिन्न विभागों द्वारा हितग्राहियों को सीधा लाभ प्रदान किया गया। राजस्व विभाग ने डिजिटल पट्टा, खसरा और बी-वन दस्तावेज वितरित किए, जिससे भूमि संबंधी मामलों में पारदर्शिता और राहत मिली। वहीं कई किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से लाखों रुपये की खाद-बीज सहायता भी उपलब्ध कराई गई। महिला स्व-सहायता समूहों को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत आर्थिक सहायता प्रदान की गई, जिससे ग्रामीण महिलाओं की आजीविका को मजबूती मिलने की उम्मीद है। श्रम विभाग द्वारा निर्माण श्रमिकों और पात्र हितग्राहियों को विभिन्न योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता चेक प्रदान किए गए।
स्वास्थ्य विभाग ने आयुष्मान कार्ड वितरण के साथ नेत्र परीक्षण, सिकल सेल जांच और क्षय रोगियों के लिए सहायता किट भी उपलब्ध कराई। दिव्यांग हितग्राहियों को बैसाखी और अन्य सहायता सामग्री दी गई, जबकि सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं की स्वीकृति भी मौके पर दी गई। शिविर में उद्यानिकी, मत्स्य पालन और कृषि विभाग द्वारा भी हितग्राहियों को बीज मिनिकिट, आइसबॉक्स और अन्य आवश्यक सामग्री वितरित की गई। जनप्रतिनिधियों ने कहा कि ऐसे शिविर शासन और जनता के बीच सीधा संवाद स्थापित करते हैं, जिससे ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान तेजी से संभव हो पाता है। बड़ी संख्या में ग्रामीणों की भागीदारी ने इस शिविर को प्रभावी और सफल बना दिया।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- क्या शिविरों में दिए जा रहे “तत्काल निराकरण” के दावे के बाद भी कई मामलों में वास्तविक फॉलोअप और स्थायी समाधान की व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है?
- क्या सभी योजनाओं का लाभ वास्तव में सबसे जरूरतमंद ग्रामीणों तक पहुंच रहा है, या चयन और सूचीकरण की प्रक्रिया में किसी स्तर पर अपारदर्शिता की संभावना बनी रहती है?
- इतनी बड़ी संख्या में योजनाओं के वितरण के बावजूद क्या प्रशासन के पास कोई सार्वजनिक डेटा है कि कितने आवेदन स्थायी रूप से लंबित रह जाते हैं और क्यों?