
रीवा:स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिले में ही वेंटिलेटर पर स्वास्थ्य व्यवस्थाएं, शिलान्यास के शोर में दबी जनता की चीखें
रीवा - मध्य प्रदेश सरकार के मंत्रियों का प्रदेश में कहीं भी दौरा करना और शिलान्यास करना उनका संवैधानिक अधिकार है, लेकिन जब जिम्मेदार अपने ही मूल विभाग की बदहाली को छोड़कर दूसरे कामों में मशगूल हो जाएं, तो जनता का सवाल उठाना लाजिमी है। विंध्य की धरा और खासकर रीवा जिले की जनता आज सरकार और विपक्ष दोनों से एक कड़वा सवाल पूछ रही है—"आखिर दूसरे विभागों की चिंता में हमारे माननीय अपना खुद का विभाग क्यों भूल गए?"
शिलान्यास की चमक, अस्पतालों में अंधेरा
हाल ही में प्रदेश के माननीय उपमुख्यमंत्री (जिनके पास स्वास्थ्य मंत्रालय का अहम प्रभार है) द्वारा रीवा जिले के जनपद पंचायत गंगेव के ग्राम पंचायत हिनौती और ग्राम गदही गौधाम में दर्जनों शिलान्यास कार्यक्रम बड़े धूमधाम से किए गए। लेकिन सवाल यह उठता है कि रीवा मुख्यालय से लेकर इन कार्यक्रम स्थलों के बीच पड़ने वाले दर्जनों शासकीय औषधालयों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की सुध किसने ली? क्या इस पूरे दौरे के दौरान माननीय मंत्री जी ने किसी एक भी अस्पताल का औचक निरीक्षण करने की जहमत उठाई? आज ग्रामीण अंचलों में आयुर्वेद और एलोपैथिक अस्पतालों की जो जर्जर स्थिति है, वह किसी से छिपी नहीं है। स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिले में ही शहरी और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की बदहाली यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर जमीनी सुधार के लिए अब तक क्या प्रयास किए गए?
'संजय गांधी अस्पताल' का ढहता भरोसा
एक दौर था जब कांग्रेस सरकार के समय बना संजय गांधी अस्पताल पूरे विंध्य क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी माना जाता था। केवल रीवा ही नहीं, बल्कि पूरे रीवा संभाग के गंभीर मरीज एक बड़ी उम्मीद लेकर यहाँ आते हैं। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में यहाँ जिस तरह की लापरवाही और अप्रिय घटनाएं सामने आई हैं, उसने सरकारी स्वास्थ्य तंत्र के प्रति जनता के मन में विश्वास की जगह 'भय' पैदा कर दिया है। जो घटनाएं सालों में नहीं हुईं, वे अब आम बात हो चुकी हैं। जनता की मजबूरी: रीवा और विंध्य का गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार इलाज के लिए नागपुर, प्रयागराज, बनारस, दिल्ली या मुंबई जाने का खर्च नहीं उठा सकता। उसकी मजबूरी इसी रीवा के सरकारी तंत्र के भरोसे जीना और मरना है। ऐसे में क्या सूबे के मुख्यमंत्री जी का यह कर्तव्य नहीं बनता कि वे रीवा की इस दम तोड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था पर विशेष ध्यान दें?
सत्ता मदमस्त, विपक्ष मौन: जनता जाए तो कहाँ जाए?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे हैरान करने वाली भूमिका विपक्ष की रही है। रीवा संभाग में स्वास्थ्य सेवाओं के इतने बुरे हाल होने और लगातार हो रही बड़ी घटनाओं के बावजूद विपक्ष की 'रहस्यमयी चुप्पी' जनता की समझ से परे है। आखिर विपक्ष किस बात का इंतजार कर रहा है? राजनीति के खेल में सिक्के के दो पहलू हो सकते हैं, और हो सकता है कि परदे के पीछे की कहानी कुछ और हो। लेकिन रीवा की भोली-भाली जनता इन सियासी पहलुओं में नहीं उलझना चाहती। जनता को न तो सत्ता पक्ष की बयानबाजी से सरोकार है और न ही विपक्ष की रणनीतियों से। जनता को सिर्फ और सिर्फ 'न्याय' और 'बेहतर इलाज' चाहिए।
बड़ा सवाल:
जनता ने किसी एक व्यक्ति को देखकर नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के 'दल और उसकी नीतियों' पर भरोसा करके वोट दिया था। जनता ने अपनी सुरक्षा और हितों को सुरक्षित रखने का विश्वास जताया था, लेकिन आज वही जनता खुद को असुरक्षित महसूस कर रही है। अगर सत्ता पक्ष अपनी जिम्मेदारी भूल चुका है और विपक्ष अपनी भूमिका, तो फिर लोकतंत्र में जनता की आवाज कौन उठाएगा? विंध्य की जनता आज न्याय की गुहार लगा रही है।