| बीजापुर; माओवाद की छाया से निकले बच्चे बोले—‘हमें बंदूक नहीं, स्कूल चाहिए’; कलेक्टर से मांगा भवन, मिला भरोसा Aajtak24 News |
बीजापुर - दशकों तक माओवादी प्रभाव और भय के माहौल में जीवन बिताने वाले बच्चों की आंखों में अब एक नया सपना दिखाई दे रहा है—अच्छी शिक्षा, बेहतर स्कूल और बदलता भविष्य। बीजापुर जिले के उसूर ब्लॉक के पुजारी कांकेर, गलगम और मारूडबाका गांवों के बच्चों के लिए आयोजित विशेष एक्सपोजर विजिट ने केवल एक भ्रमण नहीं कराया, बल्कि उन बच्चों को उस दुनिया से परिचित कराया जहां शिक्षा अवसर बनती है और भविष्य दिशा तय करता है। इस पहल का उद्देश्य उन बच्चों को विकास, शिक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं से जोड़ना था, जो लंबे समय तक संघर्ष और सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में पले-बढ़े हैं। प्रशासन की कोशिश थी कि बच्चों के भीतर नई सोच और बड़े सपनों की शुरुआत हो।
जब बच्चों ने पहली बार देखा ‘पढ़ाई का बड़ा संसार’
एक्सपोजर विजिट के दौरान बच्चों को ज्ञानगुड़ी एजुकेशन सिटी ले जाया गया। यहां उन्होंने विभिन्न शिक्षण संस्थानों को देखा और समझा कि बेहतर शिक्षा व्यवस्था कैसी होती है। बच्चों ने विद्यालयों के प्राचार्यों से बातचीत की और जाना कि अनुशासन, पढ़ाई और अवसर कैसे जीवन बदल सकते हैं। बच्चों ने सेंट्रल लाइब्रेरी का भ्रमण भी किया। कई बच्चों के लिए यह पहली बार था जब उन्होंने इतने बड़े स्तर पर किताबें और अध्ययन की सुविधाएं देखीं। यह अनुभव उनके लिए केवल देखने का नहीं बल्कि अपने गांव और भविष्य की तुलना करने का अवसर भी बना।
स्कूल से आगे—प्रशासन और व्यवस्था को भी समझा
भ्रमण को केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रखा गया। बच्चों को कलेक्टर कार्यालय और जिला पंचायत ले जाया गया, जहां उन्हें बताया गया कि जाति प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, आधार कार्ड जैसी सुविधाएं कैसे काम करती हैं और पंचायत व्यवस्था गांवों तक कैसे पहुंचती है। इसके बाद बच्चों ने जिला अस्पताल का भ्रमण किया और ओपीडी, ब्लड बैंक तथा एक्स-रे जैसी सेवाओं को करीब से समझा। इसका उद्देश्य बच्चों में संस्थागत व्यवस्था के प्रति भरोसा और समझ विकसित करना था।
जब बच्चों ने कहा—‘हमारा स्कूल अभी भी झोपड़ी में चलता है’
कार्यक्रम का सबसे भावनात्मक क्षण तब आया जब कलेक्टर विश्वदीप ने बच्चों से बातचीत की और पूछा कि उन्हें सबसे ज्यादा क्या अच्छा लगा। बच्चों का जवाब सीधा था—उन्हें बड़े स्कूल अच्छे लगे। फिर उन्होंने बताया कि उनके गांव में आज भी स्कूल झोपड़ी जैसी व्यवस्था में संचालित होता है। इसके बाद बच्चों ने स्कूल भवन, ड्रेस, टाई, जूते और मोजों की मांग रखी। कलेक्टर ने बच्चों को भरोसा दिलाया कि स्कूल भवन निर्माण और आवश्यक सुविधाओं को लेकर सकारात्मक प्रयास किए जाएंगे। यह आश्वासन बच्चों के लिए केवल घोषणा नहीं बल्कि उम्मीद का संकेत बन गया।
फिल्म का सवाल और एक नया अनुभव
संवाद के दौरान जब बच्चों से पूछा गया कि क्या उन्होंने कभी फिल्म देखी है, तो जवाब मिला—“नहीं”। इसके बाद बच्चों के लिए प्रेरणादायी फिल्म का विशेष प्रदर्शन कराने के निर्देश दिए गए। यह पहल बच्चों को नए अनुभव और प्रेरणा से जोड़ने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। बीजापुर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह पहल केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि उस बदलाव का संकेत है, जहां सुरक्षा के बाद अब शिक्षा और अवसर को विकास का अगला चरण बनाया जा रहा है। लेकिन असली सवाल अब यही रहेगा—क्या बच्चों की मांग पर स्कूल भवन और संसाधन समय पर जमीन पर उतर पाएंगे?
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
1. जिन गांवों के बच्चों ने बताया कि उनका स्कूल अभी झोपड़ी में संचालित हो रहा है, वहां स्थायी स्कूल भवन निर्माण की स्वीकृति, बजट और समय-सीमा क्या है?
2. एक्सपोजर विजिट के बाद क्या प्रशासन बच्चों की पढ़ाई, उपस्थिति और स्कूल छोड़ने की दर पर कोई दीर्घकालिक मॉनिटरिंग करेगा या यह केवल एक दिवसीय कार्यक्रम रहेगा?
3. माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में शिक्षा सुधार के लिए पिछले तीन वर्षों में कितने स्कूल भवन स्वीकृत हुए, कितने बने और कितने अब भी अधूरे हैं?