रीवा और मऊगंज में खून से सने राष्ट्रीय राजमार्ग, प्रशासन मौन, विपक्ष बेअसर! Aajtak24 News

रीवा और मऊगंज में खून से सने राष्ट्रीय राजमार्ग, प्रशासन मौन, विपक्ष बेअसर! Aajtak24 News

रीवा/मऊगंज - क्या रीवा और मऊगंज जिले की सड़कें अब केवल भीषण दुर्घटनाओं और मौतों का पर्याय बनकर रह गई हैं? यह एक ऐसा सुलगता हुआ सवाल है जिसे आज क्षेत्र का हर नागरिक पूछ रहा है। राष्ट्रीय राजमार्ग 30 और 135 (पुराना 35) हो, या फिर ग्रामीण अंचलों की सड़कें—चाहे वे प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत बनी हों, मंडी निधि से या नाबार्ड से—सभी की गुणवत्ता इस कदर घटिया है कि ये विकास के रास्ते नहीं, बल्कि सीधे मौत के गड्ढे साबित हो रहे हैं। रीवा और मऊगंज जिले का शायद ही कोई ऐसा गांव बचा हो, जहाँ सड़क हादसों में दो-चार मासूमों या घर के चिरागों की मौत न हुई हो।

भ्रष्टाचार की गवाही देती अधूरी सर्विस रोड और गायब पटरियां

तकनीकी नियमों के अनुसार किसी भी मुख्य सड़क या नेशनल हाईवे के दोनों ओर पटरियों (Sholders) का होना अनिवार्य है, लेकिन यहाँ की सड़कों पर पटरियां या तो गायब हैं या उन पर अवैध कब्जे हैं। गढ़ थाना क्षेत्र के लाहोरिया पारसी का उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ एक ही झटके में पांच लोगों की जान चली गई थी। इस भीषण हादसे के बाद भी न तो शासन जागा और न ही सड़क का निर्माण दुरुस्त हुआ। आज भी राष्ट्रीय राजमार्ग 30 और 135 पर सर्विस रोड अधूरी पड़ी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों का हाल तो और भी बदतर है। जहाँ डामरीकरण या कंक्रीट की सड़कें बनी भी हैं, वहाँ पटरियों पर कहीं गोबर के उपले थपे हैं, कहीं मवेशी बंधे हैं तो कहीं अतिक्रमण का बोलबाला है।

पुलिस जांच और मुआवजे के खेल में उलझती जिंदगी

दुर्भाग्य की बात यह है कि प्रशासन का काम केवल दुर्घटना के बाद लाशें गिनना, पुलिस मर्ग कायम करना और मुआवजे की फाइल आगे बढ़ाना बनकर रह गया है। आज तक किसी भी हादसे के बाद दुर्घटना के मूल कारणों की निष्पक्ष तकनीकी जांच कर दोषी ठेकेदारों या लापरवाह अधिकारियों पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की गई। एक तरफ सरकार लाडली बहना, लाडली लक्ष्मी, किसान सम्मान निधि और निशुल्क अनाज जैसी योजनाएं चलाकर जनता को राहत देने का दावा करती है, लेकिन दूसरी तरफ, इन्हीं योजनाओं के लाभार्थियों के घरों में मातम पसरा है। सरकार द्वारा दिया जाने वाला निशुल्क उपहार या राशन, उस असहनीय पीड़ा और खालीपन को कभी नहीं भर सकता जो अपनों के बिछड़ने से पैदा होता है।

मूकदर्शक विपक्ष और आरटीओ की बड़ी लापरवाही

इस पूरे परिदृश्य में विपक्ष की भूमिका भी बेहद निराशाजनक और कटघरे में है। साल 2004 के बाद से विंध्य क्षेत्र के इन ज्वलंत और संवेदनशील मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाने में विपक्ष पूरी तरह नाकाम रहा है। क्या विपक्ष को प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण हो रही ये मौतें दिखाई नहीं देतीं? सड़कों की खराबी के साथ-साथ एक बड़ा पहलू यातायात नियमों की अनदेखी और आरटीओ (RTO) विभाग की सुस्ती भी है। आज जिस रफ्तार से मोटरसाइकिलों की बिक्री बढ़ रही है, क्या आरटीओ विभाग उसी गंभीरता से ड्राइविंग लाइसेंस जारी कर रहा है? बिना हेलमेट के फर्राटा भरते वाहन चालकों पर नकेल कसने के लिए अब इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों (CCTV और ऑटोमैटिक चालान) से कड़ाई से जांच होनी चाहिए।

'दैनिक आज तक 24' की जनता से अपील: अधिकांश मौतें सिर पर गंभीर चोट लगने के कारण हो रही हैं। ग्रामीण सड़कों के बीचों-बीच जो खतरनाक दरारें और गड्ढे बन गए हैं, उनमें दोपहिया वाहन अनियंत्रित हो रहे हैं। अतः जनता को भी आत्ममंथन करने की जरूरत है। वाहन चलाते समय अत्यधिक सतर्कता बरतें और हेलमेट का अनिवार्य रूप से उपयोग करें, क्योंकि अपनी सुरक्षा अपने हाथ में है।

Post a Comment

Previous Post Next Post