मऊगंज; खनिज और राजस्व विभाग के आंकड़ों में भारी 'खेल'; रिकॉर्ड पर खदानें गायब Aajtak24 News

मऊगंज; खनिज और राजस्व विभाग के आंकड़ों में भारी 'खेल'; रिकॉर्ड पर खदानें गायब Aajtak24 News

मऊगंज - मऊगंज जिले में खनिज विभाग और राजस्व विभाग के कागजी आंकड़ों और धरातल की हकीकत में एक ऐसा हैरान करने वाला अंतर सामने आया है, जो सीधे तौर पर एक बड़े प्रशासनिक भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। सरकारी रिकॉर्ड खंगालने पर पता चलता है कि खनिज विभाग के पास क्षेत्र में मिट्टी और मोरम की अधिकृत खदानों की कोई वैध स्वीकृति ही नहीं है। विभाग के कागजों पर यदि कुछ स्वीकृत है, तो वो महज पत्थर की खदानें हैं। ​इसके विपरीत, यदि धरातल पर देखा जाए तो रीवा और मऊगंज जिले के चप्पे-चप्पे पर हजारों की संख्या में मिट्टी और मोरम की अवैध खदानें बेधड़क संचालित हो रही हैं।

​यक्ष प्रश्न: बिना खदान के कहाँ से आ रही है लाखों क्यूबिक फीट मोरम?

​इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह खड़ा होता है कि यदि शासन के अभिलेखों में मिट्टी और मोरम की खदानें संचालित ही नहीं हैं, तो फिर क्षेत्र में बन रहे राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways), ग्रामीण संपर्क मार्गों और गगनचुंबी इमारतों की फिलिंग (पटाई) में दिन-रात इस्तेमाल हो रही लाखों-करोड़ों टन मिट्टी और मोरम कहाँ से आ रही है? ​यह साफ तौर पर दर्शाता है कि प्रशासन की नाक के नीचे बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन का काला कारोबार फल-फूल रहा है, जिसकी धरातल और रिकॉर्ड स्तर पर उच्च स्तरीय जांच होना बेहद अनिवार्य है।

​विभागों के पास कोई जवाब नहीं; लंबाई, चौड़ाई और गहराई का कोई हिसाब नहीं

​हैरानी की बात यह है कि जब इस संबंध में जिम्मेदार विभागों से जानकारी मांगी जाती है, तो उनके पास इन अवैध खदानों की सटीक संख्या, उनकी लंबाई, चौड़ाई और गहराई को लेकर कोई स्पष्ट जवाब नहीं होता। प्रशासन को चाहिए कि वह राजस्व विभाग, खनिज विभाग और वन विभाग को संयुक्त रूप से निर्देशित करे कि वे अपने-अपने कार्य क्षेत्रों का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करें और यह स्पष्ट करें कि वर्तमान में कहाँ और कितनी खदानें किस हैसियत से चल रही हैं।

​सिक्के का दूसरा पहलू: अवैध खदानें बनीं 'जल संवर्धन' का जरिया, पर सरकार को भारी वित्तीय चपत

​इस पूरे अवैध खेल का एक बेहद दिलचस्प और सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। वर्तमान भीषण गर्मी के दौर में, जहां सरकारी अमला जल संवर्धन (Water Conservation) के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहा है, वहीं ये अवैध रूप से खोदी गई गहरी खदानें बारिश के पानी के भंडारण का सबसे बड़ा और उपयुक्त जरिया बन चुकी हैं। कागजों पर दर्ज तालाब भले ही सूखे हों, लेकिन धरातल पर इन अवैध खदानों में जमा पानी क्षेत्र के भूजल स्तर (Groundwater Level) को थामने में मददगार साबित हो रहा है। ​परंतु, इस पर्यावरणीय लाभ की आड़ में सरकार को मिलने वाले करोड़ों रुपये के राजस्व (Royalty) की जो डकैती हो रही है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह सीधे तौर पर सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगाने का मामला है।

​जनहित में 'दैनिक आज तक 24' की मांग

​इस गंभीर और दोहरे संकट पर अब क्षेत्र के प्रबुद्ध समाजसेवियों, आरटीआई कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों को मुखर होना होगा। 'दैनिक आज तक 24' शासन और जिला प्रशासन से यह मांग करता है कि: ​संयुक्त सर्वे कराया जाए: राजस्व, खनिज और वन विभाग की एक संयुक्त टीम बनाकर इन सभी अवैध खदानों का सर्वे हो और इन्हें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए।

​राजस्व चोरी रोकी जाए: इन खदानों को नियमानुसार वैध कर शासन के खाते में रॉयल्टी जमा कराई जाए ताकि अवैध कमाई भू-माफियाओं की जेब में जाने के बजाय विकास कार्यों में लगे। ​सुरक्षित जलाशय के रूप में विकास: जिन खदानों से उत्खनन पूरा हो चुका है, उन्हें सुरक्षित 'जलाशय' या 'अमृत सरोवर' के रूप में तब्दील कर उनके चारों तरफ अनिवार्य रूप से वृक्षारोपण किया जाए, जिससे पशु-पक्षियों और पर्यावरण दोनों की रक्षा हो सके।

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