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| रीवा; विरासत से सिमटकर 'शोपीस' बना फलों का राजा: बगीचे गायब, राजस्व रिकॉर्ड से वृक्ष विलुप्त Aajtak24 News |
रीवा/मऊगंज - 'फलों का राजा आम' आज के दौर में केवल नाम मात्र का राजा रह गया है। समाज ने आम को राजा की उपमा यूं ही नहीं दी थी; इसके पीछे एक गहरा सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक अंतर्संबंध था। आम सिर्फ एक स्वादिष्ट फल नहीं, बल्कि हमारे विंध्य क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, संस्कृति और पर्यावरण का एक सुदृढ़ आधार स्तंभ हुआ करता था। लेकिन आज कंक्रीट के बढ़ते जाल, भू-माफियाओं के दखल और आधुनिकता की अंधी दौड़ ने इस राजा को सिंहासन से उतारकर महज एक 'शोपीस' बना दिया है।
थाली का स्वाद भी छीन रही बगीचों की बर्बादी
एक दौर था जब आम का पेड़ हर ग्रामीण परिवार और समाज की बुनियादी जरूरतों का अभिन्न हिस्सा था। तपती गर्मियों में लू से बचाने वाला कच्चे आम का पना, सालभर सब्जी का स्वाद बढ़ाने वाली सूखे आम की अमचूर और चटपटे पारंपरिक अचार भोजन के मुख्य माध्यम हुआ करते थे। यह विंध्य के ग्रामीण अंचलों की भोजन शैली का एक आवश्यक और अनिवार्य हिस्सा था। किंतु, आज बेहद अफसोसजनक स्थिति है कि ये आवश्यक चीजें अब आम ग्रामीण समाज की थाली से गायब होकर केवल रईसों के 'शौक' और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैकेट बंद डिब्बों तक सीमित रह गई हैं। इसका सीधा कारण गांवों से पारंपरिक बड़े बगीचों का लगातार खत्म होना और नए पौधे न लगाया जाना है।
राजस्व रिकॉर्ड से गायब हुए पेड़: सरकारी अनदेखी का शिकार
बगीचों के उजड़ने की सबसे बड़ी वजह सरकार और विशेषकर राजस्व विभाग की घोर लापरवाही और उदासीनता सामने आ रही है।
खसरे और नक्शे से गायब वृक्ष: पहले सरकारी राजस्व अभिलेखों (खसरे, बी-1 और नक्शे) में बकायदा जमीन पर मौजूद फलदार वृक्षों की संख्या दर्ज होती थी। इस प्रविष्टि के कारण पेड़ों को काटने पर सख्त कानूनी बंदिशें थीं और पटवारियों को इसकी जवाबदेही तय करनी होती थी।
कागजों पर सिमटी संख्या: आज स्थिति यह है कि गांवों में बगीचों की संख्या लगातार सिमट रही है, और वृक्षों की वास्तविक संख्या राजस्व रिकॉर्ड पर कहीं स्पष्ट दिखाई ही नहीं देती। इसी प्रशासनिक ढील और लापरवाही का फायदा उठाकर भू-माफिया और प्रॉपर्टी डीलर धड़ल्ले से हरे-भरे प्राचीन बगीचों पर कुल्हाड़ी चलाकर वहाँ कॉलोनियां काट रहे हैं।
मनुष्य और पक्षियों का साझा 'अन्नदाता' संकट में
मई-जून के इस भीषण मौसम में जब गांवों में हरी सब्जियों का अकाल पड़ता है और जंगलों में बेजुबान पक्षियों के लिए भोजन का अभाव हो जाता है, तब यह आम का पेड़ ही था जो मनुष्य और पक्षी दोनों का पेट भरता था। यह प्रकृति का वह अनमोल उपहार था जो जेठ की दुपहरी में पक्षियों को बसेरा और इंसानों को ठंडी छांव के साथ पौष्टिक भोजन देता था। आज जब रीवा और मऊगंज के गांवों में पेड़ ही नहीं बचेंगे, तो तपती गर्मियों में बेजुबान पक्षी और ग्रामीण अंचल के लोग इस पारिस्थितिक (Ecological) संकट से कैसे उबरेंगे?
वैकल्पिक दिखावे से नहीं बचेगा पर्यावरण: 'आज तक 24' की चेतावनी
यदि समाज और सरकार ने समय रहते दीर्घकालिक योजना बनाकर आम के पारंपरिक बगीचों (अमराई) की संख्या को नहीं बढ़ाया, तो गमलों और शोपीस कॉलोनियों में लगे हाइब्रिड और विदेशी पौधे इस भारी नुकसान की भरपाई कभी नहीं कर पाएंगे। सरकारों और जिला प्रशासन को यह समझना होगा कि कॉलोनियों की खूबसूरती बढ़ाने वाले 'शोपीस' और सजावटी पेड़ों से न तो पर्यावरण का भला होने वाला है और न ही मनुष्य का जीवन खुशहाल रह सकता है। आम के वजूद को बचाने के लिए अब सरकारी कागजों और फाइलों से बाहर निकलकर धरातल पर नए बगीचे लगाने होंगे और पुराने फलदार पेड़ों को कटने से बचाना होगा, अन्यथा 'फलों का राजा' आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ किताबों और कहानियों का एक पन्ना बनकर रह जाएगा।
