| दुर्ग; जनदर्शन में जनता का ‘दबाव’: पुल से लेकर नाली तक उठे सवाल, 96 आवेदन पर कलेक्टर का सख्त रुख Aajtak24 News |
दुर्ग - जिले में आयोजित जनदर्शन कार्यक्रम एक बार फिर जनता और प्रशासन के बीच सीधा संवाद का मंच साबित हुआ, जहां ग्रामीणों से लेकर शहरी क्षेत्रों के लोगों ने अपनी गंभीर समस्याएं खुलकर रखीं। जिला कार्यालय के सभाकक्ष में आयोजित इस जनदर्शन में कुल 96 आवेदन प्राप्त हुए, जिन पर कलेक्टर श्री अभिजीत सिंह ने मौके पर ही संज्ञान लेते हुए संबंधित अधिकारियों को त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए। कार्यक्रम में अपर कलेक्टर श्रीमती योगिता देवांगन भी मौजूद रहीं। कलेक्टर ने सभी आवेदकों की समस्याएं गंभीरता से सुनीं और कई मामलों में संबंधित विभागीय अधिकारियों से फोन पर तत्काल जानकारी लेकर कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
ग्राम मोरिद के ग्रामीणों ने नहर पर बने पुल के पुनर्निर्माण की मांग रखी। ग्रामीणों ने बताया कि सड़क सीमेंटीकरण के बाद पुल की ऊंचाई सड़क के बराबर हो गई है, जिससे आए दिन दुर्घटनाओं की स्थिति बन रही है और बारिश के दौरान जलभराव की समस्या भी गंभीर हो जाती है। इस पर कलेक्टर ने सिंचाई विभाग के कार्यपालन अभियंता को मौके पर निरीक्षण कर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए। वहीं ग्राम सांतरा के मछुआरों ने अलग से मत्स्य सहकारी संस्था के पंजीयन की मांग की। उनका कहना था कि पुरानी संस्था स्थानीय लोगों को अवसर नहीं दे रही है, जिससे उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है। इस पर कलेक्टर ने उप संचालक मत्स्य विभाग को जांच कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा।
दूसरी ओर वार्ड 59 हेरिटेज कॉलेज क्षेत्र के निवासियों ने नेशनल हाईवे निर्माण के दौरान नाली व्यवस्था में बदलाव को लेकर शिकायत दर्ज कराई। रहवासियों ने चेतावनी दी कि मौजूदा व्यवस्था से बारिश में कई कॉलोनियों में जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति बन रही है। इस पर कलेक्टर ने एसडीओ दुर्ग को स्थल निरीक्षण कर समाधान निकालने के निर्देश दिए। प्रशासन का कहना है कि जनदर्शन कार्यक्रम का उद्देश्य समस्याओं का त्वरित समाधान और शासन की योजनाओं को जमीनी स्तर तक प्रभावी बनाना है।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
- जनदर्शन में हर बार सैकड़ों आवेदन आते हैं, लेकिन इनमें कितने मामलों का स्थायी समाधान होता है और कितने बार-बार लंबित रह जाते हैं?
- क्या पुल और नाली जैसी बुनियादी ढांचे की समस्याएं केवल शिकायत के बाद ही सामने आती हैं, या विभागीय स्तर पर पहले से कोई तकनीकी ऑडिट प्रणाली काम कर रही है?
- क्या मत्स्य सहकारी संस्था जैसे मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोई स्वतंत्र जांच तंत्र है, ताकि स्थानीय मछुआरों के अधिकारों की रक्षा हो सके?