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| रीवा संभाग में 'ऑपरेशन प्रहार-2' बनाम 'सफेदपोश संरक्षण'; शिक्षा के मंदिरों में नशे का कारोबार Aajtak24 News |
रीवा/सीधी - रीवा संभाग में प्रतिबंधित नशीली सिरप और गोलियों के अवैध कारोबार ने अब सारी सीमाएं लांघ दी हैं। कल तक जो युवा पीढ़ी गलियों और खंडहरों में नशे की गिरफ्त में थी, आज उस जहर के गोदाम शिक्षा के उन पवित्र मंदिरों (स्कूलों) में बनाए जा रहे हैं, जहां बच्चों का भविष्य गढ़ा जाता है। सीधी के गजराज स्कूल में हुई हालिया कार्रवाई इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। हालांकि, पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) गौरव राजपूत के निर्देशन में 'ऑपरेशन प्रहार-2' अपराधियों पर शिकंजा जरूर कस रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इस अभियान की सफलता के पीछे छिपे विभागीय घुन की ओर भी इशारा कर रही है।
'सेवा शुल्क' के खेल में बीट प्रभारी मौन?
इस पूरे अवैध नेटवर्क में सबसे बड़ा और गंभीर सवाल स्थानीय बीट प्रभारियों की भूमिका पर खड़ा होता है। संभाग के कई क्षेत्रों से लगातार यह शिकायतें आ रही हैं कि जिन बीट प्रभारियों पर नशे के सौदागरों को दबोचने की जिम्मेदारी है, वे मूकदर्शक बने हुए हैं। सूत्र बताते हैं कि 'सेवा शुल्क' के नाम पर दैनिक और मासिक रूप से मोटी रकम वसूलने का खेल पर्दे के पीछे धड़ल्ले से चल रहा है। यही वजह है कि जमीनी स्तर पर सब कुछ जानते हुए भी स्थानीय अमला बड़ी कार्रवाई से बचता रहा है।
लोरी और गढ़ जैसे इलाके बने नशे के गढ़
नशे के इस संगठित जाल को समझना हो तो गढ़ और लोरी जैसे थाना क्षेत्रों की जमीनी हकीकत को देखा जा सकता है, जहां खुलेआम मौत का यह सामान बेचा जा रहा है। इन संवेदनशील इलाकों में नशीली दवाओं की बेखौफ बिक्री इस बात का पुख्ता सबूत है कि यह धंधा बिना स्थानीय साठगांठ के संभव नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस रैकेट में कई निजी और शासकीय संस्थाओं के जिम्मेदार चेहरों की संलिप्तता भी सामने आ रही है।
जनता की मांग: संभाग की जनता अब यह मांग कर रही है कि 'ऑपरेशन प्रहार-2' का हंटर केवल छोटे-मोटे सप्लायरों (मोहरों) पर ही न चले, बल्कि उन बीट प्रभारियों और विभागीय काली भेड़ों पर भी गिरे जो मोटी अवैध कमाई के चक्कर में युवाओं के भविष्य को गर्त में धकेल रहे हैं। जब तक थानों में बैठे इन 'मददगारों' पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक नशे के इस साम्राज्य को उखाड़ फेंकना नामुमकिन रहेगा।
