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| रीवा में 'कट्टा राज': रसूख के रसातल में कानून, वीडियो सबूत के बाद भी खाकी के हाथ खाली Aajtak24 News |
रीवा - विंध्य की हृदयस्थली और सफेद शेरों की धरती कहे जाने वाले रीवा जिले में इन दिनों कानून का इकबाल खत्म होता नजर आ रहा है। जिले में अवैध हथियारों और 'कट्टों' का प्रदर्शन अब आम बात हो गई है। ताज़ा घटनाक्रम ने न केवल जिले की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है, बल्कि पुलिस प्रशासन की कार्यशैली को भी गहरे संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है। एक धार्मिक आयोजन, जिसे शांति और आस्था का केंद्र होना चाहिए था, वहां सरेराह हुई 'हर्ष फायरिंग' ने एक युवक को अस्पताल पहुंचा दिया।
धार्मिक आयोजन में गोलियों की गूंज
मिली जानकारी के अनुसार, जिले में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान उत्साह और प्रदर्शन की होड़ में एक अज्ञात व्यक्ति द्वारा हवाई फायरिंग की गई। भीड़भाड़ वाले इस आयोजन में अचानक चली गोली वहां मौजूद एक युवक के पैर में जा लगी। गोली चलते ही आयोजन स्थल पर भगदड़ मच गई और खून से लथपथ घायल युवक को आनन-फानन में उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया। यह घटना बताती है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में हथियारों का प्रदर्शन किस कदर बेखौफ हो चुका है।
साक्ष्य मौजूद, फिर भी खामोश है खाकी?
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू पुलिस की भूमिका है। सूत्रों और स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि पुलिस के पास इस पूरी घटना का स्पष्ट वीडियो फुटेज मौजूद है। इस वीडियो में फायरिंग करने वाला आरोपी साफ तौर पर नजर आ रहा है। तकनीक के इस युग में जहाँ एक छोटे से सुराग से अपराधी पकड़े जाते हैं, वहां रीवा पुलिस वीडियो साक्ष्य होने के बावजूद अब तक आरोपी की पहचान सार्वजनिक करने और उसे गिरफ्तार करने में नाकाम रही है।
दबाव का खेल: बदल गए फरियादी के बोल
मामले ने तब एक नया मोड़ लिया जब अस्पताल में भर्ती पीड़ित (फरियादी) ने अचानक अपने बयान बदल दिए। चर्चा है कि जिले के कुछ सफेदपोशों और रसूखदारों के दबाव में पीड़ित को चुप करा दिया गया है। अब फरियादी का कहना है कि वह आरोपी को नहीं पहचानता। पुलिस इसी 'बयानबाजी' की आड़ लेकर अपनी पीठ बचा रही है। पुलिस का तर्क है कि जब फरियादी ही सहयोग नहीं कर रहा, तो कार्रवाई कैसे हो?
जनता के चुभते सवाल: क्या रसूख के आगे कानून बौना है?
पुलिस के इस लचर तर्क पर आम जनता में भारी आक्रोश है। बुद्धिजीवियों और स्थानीय नागरिकों ने गंभीर सवाल उठाए हैं:
यदि पुलिस के पास वीडियो फुटेज जैसा पुख्ता तकनीकी साक्ष्य है, तो वह स्वतः संज्ञान (Suo Moto) लेकर कार्रवाई क्यों नहीं कर रही?
क्या किसी अपराधी को पकड़ने के लिए केवल पीड़ित का बयान ही अनिवार्य है, जबकि अपराध सार्वजनिक रूप से हुआ है?
क्या रीवा में राजनीतिक रसूख इतना हावी हो चुका है कि वर्दीधारी केवल मूकदर्शक बनकर रह गए हैं?
खौफ के साये में रीवा
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस और अपराधियों के बीच बढ़ती 'साठगांठ' और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण जिले में अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। सरेराह गोलीबारी की इन घटनाओं ने आम नागरिकों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। यदि समय रहते वीडियो साक्ष्यों के आधार पर कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो वह दिन दूर नहीं जब रीवा 'अपराध की राजधानी' के रूप में जाना जाएगा। अब देखना यह है कि रीवा के आला अधिकारी इस मामले में हस्तक्षेप कर कानून का राज स्थापित करते हैं या फिर रसूख के दबाव में यह फाइल भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगी।
