| गौरेला-पेंड्रा; GPM में कलेक्टर ने बैंकों से पूछा—योजनाओं का पैसा आखिर पहुंच क्यों नहीं रहा Aajtak24 News |
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही - सरकारी योजनाओं के लाभ, बैंकिंग सेवाओं की पहुंच और स्वरोजगार को लेकर अक्सर बड़े लक्ष्य तय किए जाते हैं, लेकिन इन योजनाओं की असली परीक्षा बैंक काउंटर और लाभार्थियों के अनुभव से होती है। इसी कड़ी में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में जिला स्तरीय बैंकर्स समिति की बैठक आयोजित की गई, जहां बैंकिंग प्रदर्शन और योजनाओं की प्रगति की समीक्षा की गई। कलेक्ट्रेट स्थित अरपा सभागार में आयोजित इस बैठक की अध्यक्षता कलेक्टर डॉ. संतोष कुमार देवांगन ने की। बैठक का केंद्र बिंदु रहा—बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बढ़ाना, लंबित ऋण प्रकरणों का निराकरण और शासकीय योजनाओं के हितग्राहियों तक वित्तीय सहायता सुनिश्चित करना।
बैठक में जिले के बैंकों के सीडी रेशियो (क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात), ऋण स्वीकृति और वितरण की स्थिति की समीक्षा की गई। कलेक्टर ने बैंक अधिकारियों को निर्देश दिए कि पात्र हितग्राहियों को प्राथमिकता के आधार पर योजनाओं का लाभ दिया जाए और केवल आंकड़ों तक सीमित न रहा जाए। बैठक के दौरान प्रधानमंत्री स्वरोजगार सृजन कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन सहित कई योजनाओं की समीक्षा की गई। लंबित मामलों पर चिंता जताते हुए अधिकारियों को जल्द निराकरण के निर्देश दिए गए।
किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे भी बैठक के केंद्र में रहे। किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी), डेयरी और मत्स्यपालन गतिविधियों को बढ़ावा देने, पीएम विश्वकर्मा योजना और मुद्रा लोन की प्रगति पर चर्चा की गई। यह भी देखा गया कि बैंक आधारित योजनाओं का लाभ कितनी प्रभावी तरीके से लोगों तक पहुंच रहा है। वित्तीय समावेशन को लेकर प्रधानमंत्री जनधन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और अटल पेंशन योजना की स्थिति की भी समीक्षा की गई। उद्देश्य यह रहा कि बैंकिंग सुविधाएं केवल शहरों तक सीमित न रहें बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों तक मजबूत पहुंच बनाएं।
बैठक में ऋण वसूली, वित्तीय साक्षरता शिविर, नई बैंक शाखाओं के विस्तार और सामुदायिक स्तर पर ऋण वापसी तंत्र जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई। हालांकि इस पूरी समीक्षा के बीच बड़ा सवाल वही बना हुआ है—क्या योजनाओं की स्वीकृति और बैठकों की समीक्षा वास्तव में लोगों तक आसान ऋण और समय पर सहायता में बदल पा रही है, या फिर लाभार्थी अब भी बैंक और दफ्तरों के बीच फंसे हुए हैं।
आज तक 24 न्यूज़ के प्रशासन से सवाल
1. जिले में विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत बैंकों को भेजे गए कुल ऋण प्रकरणों में से कितने आवेदन बिना स्पष्ट कारण के लंबित या अस्वीकृत हैं?
2. जिन बैंकों का सीडी रेशियो लगातार कम है, उनके लिए जिला प्रशासन ने कोई जवाबदेही या सुधार की समय-सीमा तय की है या नहीं?
3. वित्तीय समावेशन योजनाओं में खाते खोलने के बाद कितने लाभार्थी वास्तव में सक्रिय बैंकिंग, बीमा या ऋण सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं—क्या इसका कोई जिला स्तरीय डेटा उपलब्ध है?