रीवा संभाग में पैर पसारता नशीली दवाओं और अवैध शराब का सिंडिकेट: क्या कागजी कार्रवाइयों तक सीमित है तंत्र? Aajtak24 News

रीवा संभाग में पैर पसारता नशीली दवाओं और अवैध शराब का सिंडिकेट: क्या कागजी कार्रवाइयों तक सीमित है तंत्र? Aajtak24 News

रीवा - अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के लिए पहचाना जाने वाला विंध्य और रीवा संभाग वर्तमान में नशे के बढ़ते प्रभाव के कारण गंभीर सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। स्थानीय जनचर्चाओं और धरातलीय रिपोर्टों की मानें तो इस क्षेत्र में नशीली दवाओं और अवैध शराब का जाल तेजी से फैला है। आज शहरी गलियों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक सिर्फ पारंपरिक नशा ही नहीं, बल्कि कोरेक्स जैसी नशीली कफ सिरप, प्रतिबंधित गोलियां और ब्राउन शुगर जैसे घातक सिंथेटिक ड्रग्स युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं। इस स्थिति ने क्षेत्र के भविष्य और सुरक्षा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

आंकड़ों की बाजीगरी और मैदानी हकीकत में अंतर

नशे के इस बढ़ते साम्राज्य के बीच पुलिस और आबकारी विभाग द्वारा लगातार धरपकड़ की कार्रवाइयां की जा रही हैं। सरकारी रिकॉर्ड में भारी मात्रा में शराब जब्ती, कफ सिरप की बरामदगी और तस्करों की गिरफ्तारी के बड़े-बड़े आंकड़े पेश कर वाहवाही लूटी जाती है। इसके बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि इन कार्रवाइयों के बाद भी नशे की उपलब्धता और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) पर कोई खास असर पड़ता नहीं दिख रहा है। सामाजिक संगठनों का आरोप है कि ये कार्रवाइयां महज सतही हैं और सिंडिकेट की जड़ों पर प्रहार करने में नाकाम साबित हुई हैं।

मूल स्रोत पर कार्रवाई न होने से उठते सवाल

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा नीतिगत और प्रशासनिक सवाल यह उठता है कि पुलिस जब भी अवैध शराब के प्रकरण बनाती है, तो वह शराब जिस मुख्य स्रोत या अधिकृत लाइसेंसी दुकान से आई होती है, वहां तक जांच की आंच क्यों नहीं पहुंचती? अक्सर छोटे-मोटे पैकार (अवैध विक्रेता) तो पकड़े जाते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे बैठे मुख्य सिंडिकेट या रसूखदार ठेकेदारों पर हाथ डालने से प्रशासनिक अमला कतराता नजर आता है। जानकारों का कहना है कि जब तक अवैध खेप के मुख्य स्रोत और परिवहन मार्गों की निष्पक्ष जांच नहीं होगी, तब तक इस अवैध कारोबार को पूरी तरह बंद कर पाना असंभव है।

कोटा सिस्टम और कथित 'सांठगांठ' का खेल

सूत्रों और स्थानीय दावों के अनुसार, इस पूरे तंत्र के फलने-फूलने के पीछे आबकारी विभाग का 'कोटा सिस्टम' और कथित मासिक सांठगांठ एक बड़ी वजह बनकर उभरी है। विभागीय नियमों के तहत दुकानों के लिए तय शराब वितरण के मासिक टारगेट को पूरा करने के चक्कर में अधिकृत सीमाओं से बाहर जाकर अवैध ठिकानों पर सप्लाई की जाने की बात सामने आती रही है। आरोप यह भी हैं कि कई बार विभागीय कार्रवाइयां कानून-व्यवस्था को बहाल करने के लिए नहीं, बल्कि आपसी प्रतिस्पर्धा या किसी ठेकेदार की टेरिटरी (क्षेत्र) की रक्षा के लिए की जाती हैं। ऐसी स्थिति नियामक संस्थाओं की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली को पूरी तरह संदिग्ध बनाती है।

सुरक्षा संकट और कड़े संकल्प की आवश्यकता

यदि क्षेत्र में नशे की इस आसान उपलब्धता और अवैध सिंडिकेट के नेटवर्क को समय रहते नहीं तोड़ा गया, तो आने वाले दिनों में विंध्य क्षेत्र में कानून व्यवस्था और नागरिक सुरक्षा का एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि नशा न केवल अपराधों को बढ़ावा देता है बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी कमजोर करता है। व्यवस्था को यह समझना होगा कि तात्कालिक प्रशासनिक दबाव में की जाने वाली दिखावे की कार्रवाइयों के बजाय, दृढ़ इच्छाशक्ति और कड़े नीतिगत संकल्पों के जरिए ही इस सामाजिक बुराई का समूल नाश किया जा सकता है।

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