महंगाई की मार से किसान परेशान, लागत बढ़ी लेकिन उपज के दाम नहीं

 

महंगाई की मार से किसान परेशान, लागत बढ़ी लेकिन उपज के दाम नहीं

रीवा/मऊगंज। रीवा और मऊगंज जिले में किसान इन दिनों बढ़ती महंगाई और खेती की लगातार बढ़ रही लागत के बीच आर्थिक दबाव से जूझ रहे हैं। किसानों का कहना है कि खाद, बीज, डीजल, कीटनाशक, मजदूरी, ट्रैक्टर और कृषि उपकरणों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन गेहूं, धान, दाल, सोयाबीन, अलसी, मटर सहित अन्य कृषि उपज के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़ रहे हैं।

किसानों के अनुसार खेती में लागत बढ़ने के कारण फसल तैयार करने में पहले की तुलना में काफी अधिक राशि खर्च करनी पड़ रही है। इसके बावजूद बाजार में उपज बेचने पर अपेक्षित मूल्य नहीं मिल पाता। कई बार किसानों को अपनी उपज निर्धारित या उम्मीद से कम कीमत पर बेचने की मजबूरी होती है। इससे खेती से मिलने वाली आमदनी और वास्तविक खर्च के बीच अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

परिवार की जरूरतें पूरी करना भी चुनौती

किसानों का कहना है कि कृषि से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा अगली फसल की तैयारी में ही खर्च हो जाता है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई, कपड़े, घरेलू जरूरतें और बेटियों की शादी के लिए जेवर व अन्य सामान जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। सोना-चांदी और अन्य जरूरी वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने ग्रामीण परिवारों का बजट और प्रभावित किया है।

जंगली जानवर और आवारा पशु भी बढ़ा रहे परेशानी

किसानों की समस्याएं केवल बढ़ती लागत और कम दाम तक सीमित नहीं हैं। खेतों में जंगली सूअर, नीलगाय, बंदर और आवारा पशुओं से फसलों को होने वाला नुकसान भी बड़ी चिंता बना हुआ है। किसानों का कहना है कि फसल में हजारों रुपये खर्च करने के बाद यदि पशुओं से नुकसान हो जाए तो पूरी मेहनत और लागत प्रभावित हो जाती है। आलू, प्याज और अन्य सब्जियों की खेती करने वाले किसानों को भी फसल बचाने में अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है।

बीमा और कर्ज को लेकर भी सवाल

किसानों के बीच फसल बीमा और कृषि ऋण को लेकर भी असंतोष है। किसानों का कहना है कि प्राकृतिक आपदा से फसल खराब होने की स्थिति में सर्वे और मुआवजे की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने की जरूरत है। वास्तविक नुकसान के आधार पर समय पर बीमा राशि और राहत उपलब्ध कराने की मांग भी किसानों द्वारा की जा रही है।

किसानों का कहना है कि सरकार से उन्हें कृषि लागत कम करने, उपज का उचित मूल्य दिलाने, फसल सुरक्षा सुनिश्चित करने और कर्ज व बीमा से जुड़ी समस्याओं का समाधान कराने की उम्मीद है। किसानों के मुताबिक खेती तभी टिकाऊ बन सकती है, जब उत्पादन लागत और कृषि उपज के बाजार मूल्य के बीच संतुलन स्थापित हो।

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